आगरालीक्स…आगरा की बोली में अब बदलाव। मिठास व अपनेपन की कमी। देशज शब्द हो रहे गायब। गुरु के बाद चचे शब्द से भी लोगों को गुरेज। सर-मैम का कल्चर..
तीन-चार दशक में बोली में आया काफी बदलाव

आगरा की बोली में अब तेजी से बदलाव आ रहा है। आगरा की बोली में पहले जो मिठास और अपनेपन का अहसास होता था, वह अब धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है। खासकर पिछले तीन दशक पहले की आगरा की बोली को आपने नोट किया हो तो वह काफी बदली है।
नाम के साथ गुरु जुड़ने से होता था गर्व का अहसास
आगरा में तीन-चार दशक पहले आगरा में गुरु शब्द का प्रयोग अधिक हुआ करता था। यमुना किनारे की बगिचियों के अलावा भगत, स्वांग, नाटक समेत अन्य क्षेत्रों में महारत हासिल करने वाले लोगों को गुरु कहकर संबोधित करते थे। मोहल्ले और बस्तियों में अपने से बड़े या समकक्ष जिनका रुतबा थोड़ा थोड़ा ज्यादा होता था, वह भी गुरु की श्रेणी में रखकर बातचीत करते थे।
आगरा में काफी लोगों के नाम से जुड़ा था गुरु शब्द
आगरा में काफी संख्या में लोग अपने नाम के साथ गुरु शब्द का इस्तेमाल होने पर गर्व का अनुभव करते थे, जैसे हां गुरु, क्या हो रहा है गुरु लेकिन यह शब्द अब प्रचलन से बाहर हो गया।
चचे के नाम से भी हुए हैं कई लोग मशहूर
इसी दरम्यान अपने से बड़े के लिए चचे शब्द का इस्तेमाल किया जाता था लोग अपने नाम के साथ चचे उपनाम के रूप में जोड़कर गर्व महसूस करते थे लेकिन अब चचे शब्द से लोगों को चिढ़ होने लगी है या गुरेज होता है।
चचे के नाम से मशहूर थे डा. अश्विनी कुमार शर्मा
पिछले साल दिवंगत हुए रंगकर्मी, समाजसेवी डाक्टर अश्विनी कुमार चचे के नाम से विख्यात थे। बडा हो या छोटा सभी उन्हें चचे कहकर ही बुलाता था।
चचे बोलने में अब प्यार नहीं अकड़ ज्यादा

आगरा में भी कई स्थानों पर ग्राहक या अन्य व्यक्ति से चचे कहा जाता है तो उसे बुरा लगता है बोलने वाले व्यक्ति की भाषा में चचे शब्द में मिठास और प्यार नहीं बल्कि अकड़ और व्यंग्य होता है। इसलिए यह शब्द भी प्रचलन से बाहर होता जा रहा है।
देशज शब्दों की कमी, मुहावरे जानते ही नहीं
आगरा की बोली में ब्रजभाषा का पुट होने के साथ देशज शब्दों का प्रयोग भी काफी किया जाता था, जिसमें मिठास होती थी भले ही वह शब्द अपभ्रंस होने के बाद बोले जाते थे, जैसे लोग नमक को नोन बोलना, नाम के पीछे रा जोड़ना जैसे रामू को रमुआ… कालू को कलुआ… रामअवतार को रामऔतर… अब सुनने को नहीं मिलते। मुहावरों को भी प्रयोग नहीं होता।
सर-मैम का कल्चर बढ़ा
आगरा की बोली में ज्यादा कुछ नहीं बढ़ा तो सर और मैम का कल्चर बढ़ गया है। अधिकांश दुकान, शोरूम, होटल, रेस्टोरेंट में के साथ आम बोलचाल की भाषा में सर-मैम ही कहा जाता है। किसी वृद्ध पुरुष और महिला से चचे, बाबा और आंटी कह दिया तो निश्चित ही कहासुनी होने की संभावना बढ़ जाती है।