आगरालीक्स…आगरा के विवि में भारत की विभिन्न भाषाओं के बीच विद्यमान एकता के मूलभूत सूत्रों को किया उजागर. भारतीय भाषा परिवार की अवधारणा पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा तथा शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत कार्यरत भारतीय भाषा समिति के संयुक्त तत्वावधान में कन्हैयालाल मुंशी हिंदी एवं भाषाविज्ञान विद्यापीठ के भाषाविज्ञान विभाग द्वारा मंगलवार को एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय “भारतीय भाषा परिवार : अवधारणा और शैक्षणिक परिप्रेक्ष्य” रहा। यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. आशु रानी के मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ। संगोष्ठी का उद्घाटन विद्यापीठ के सूर कक्ष में सरस्वती प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। बीज वक्तव्य के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के भाषाविज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. रमेश चंद्र शर्मा, मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ भाषाविद् प्रो. वी. आर. जगन्नाथन तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में सेंट जॉन्स कॉलेज, आगरा के प्राचार्य प्रो. एस. पी. सिंह उपस्थित रहे।
आगंतुक अतिथियों का स्वागत करते हुए विद्यापीठ के निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर ने कहा कि हिंदी विद्यापीठ की स्थापना हिंदी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं के तुलनात्मक साहित्यिक एवं भाषावैज्ञानिक अध्ययन के उद्देश्य से की गई थी। विद्यापीठ निरंतर हिंदी के विकास हेतु विभिन्न शैक्षणिक गतिविधियों का आयोजन करता रहा है। संगोष्ठी की संयोजक डॉ. नीलम यादव ने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय भाषा परिवार की अवधारणा भारतीय भाषा अध्ययन एवं भाषाविज्ञान के क्षेत्र में शिक्षा मंत्रालय की एक नई पहल है, जिसका उद्देश्य भारत की विभिन्न भाषाओं के बीच विद्यमान एकता के मूलभूत सूत्रों को उजागर करना है। इसी क्रम में भारतीय भाषा समिति द्वारा प्रकाशित दो पुस्तकों का लोकार्पण संगोष्ठी के दौरान आमंत्रित वरिष्ठ विद्वानों द्वारा किया गया।
अपने बीज वक्तव्य में प्रो. रमेश चंद्र शर्मा ने भारतीय भाषाविज्ञान की गौरवपूर्ण परंपरा का उल्लेख करते हुए शिक्षा, व्याकरण एवं भारतीय दर्शनों के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत की भाषाई विविधता और बहुभाषिकता अतुलनीय है तथा यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। देश के एक छोर से दूसरे छोर तक भाषाई निरंतरता विद्यमान है और प्रत्येक नई भाषा ज्ञान एवं सूचनाओं की एक नई खिड़की खोलती है। विशिष्ट अतिथि प्रो. एस. पी. सिंह ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं के विकास के लिए व्यक्त की गई अपेक्षाओं पर ईमानदारी से कार्य करने की आवश्यकता है। उपनिवेशवादी मानसिकता आज भी एक चुनौती है और हमें अपनी भाषाओं के समृद्ध अनुभव एवं ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाना होगा।
मुख्य अतिथि प्रो. वी. आर. जगन्नाथन ने अपने उद्बोधन में कहा कि भाषाओं के वितरण के दृष्टिकोण से भारत लगभग आधे एशिया और पूरे यूरोप के बराबर है। भारतीय राजकीय व्यवस्था में संघ की राजभाषा के साथ-साथ राज्यों की अपनी-अपनी राजभाषाएं हैं, जिनका उपयोग केवल कार्यालयी कार्यों तक सीमित नहीं है। भारत केवल भाषा-क्षेत्र नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक क्षेत्र भी है, जहाँ विभिन्न संस्कृतियाँ मिलकर समन्वित भारतीय संस्कृति का निर्माण करती हैं। सह-अस्तित्व की विचारधारा ही भारत का मूल विचार है।
उद्घाटन सत्र के पश्चात दो शैक्षणिक सत्र आयोजित किए गए, जिनमें प्रकाशित पुस्तकों की विषयवस्तु पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ। द्वितीय सत्र में प्रथम वक्ता के रूप में डॉ. महेश कुमार शर्मा (अकादमी निदेशक, देहरादून इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज) ने भाषाओं के अध्ययन-अध्यापन और भारत के भाषाई व्यवहार पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि मानसिक गुलामी के कारण भारतीय भाषाओं की विशेषताओं को सामने लाने के पर्याप्त अवसर नहीं मिले। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अनुभूति की सच्ची अभिव्यक्ति मातृभाषा में ही संभव है।
केंद्रीय हिंदी संस्थान के अनुसंधान एवं भाषा विकास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अरिमर्दन त्रिपाठी ने भारतीय भाषाओं की साझी भाषाई विरासत एवं तकनीकी समृद्धि पर अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि भारतीय भाषा परिवार की अवधारणा एक पैराडाइम शिफ्ट है। उन्होंने भारतीय भाषाओं के समन्वय एवं एकीकरण के लिए देवनागरी लिपि को एक महत्वपूर्ण उपकरण बताया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के भाषाविज्ञान विभाग से आए डॉ. पल्लव विष्णु ने पश्चिमी हिंदी क्षेत्र की लोकभाषाओं के संवर्धन हेतु लोक साहित्य एवं लोक संगीत को संरक्षण में शामिल करने पर बल दिया।
तीसरे सत्र में तीन शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। श्री केशरी नंदन ने हिंदी क्रियाओं के संदर्भ में भारतीय भाषाओं में निहित भाषाई एकता के अंतःसूत्रों को प्रस्तुत किया। श्री नीरव माथुर ने पूर्वोत्तर भारत की भाषाओं की साझी विशेषताओं का समाजभाषिक, मनोवैज्ञानिक एवं प्रकारवैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया। श्री सूर्यमणि ने आगरा के समाजभाषाई मानचित्र के विभिन्न पहलुओं को उदाहरण सहित रेखांकित किया। इस सत्र की विशेषज्ञ वक्ता दयालबाग शिक्षण संस्थान के संस्कृत विभाग की डॉ. अनीता ने संस्कृत एवं प्राच्य भाषाओं के संदर्भ में भारतीय भाषाओं की एकता एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला।
समापन सत्र के मुख्य अतिथि प्रो. सुधीर प्रताप सिंह ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के संदर्भ में भारतीय भाषाओं के उन्नयन एवं आपसी सद्भाव से जुड़े मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सी. आर. जगन्नाथन ने बहुभाषी भारत में भाषाओं के समग्र विकास के लिए ठोस भाषा नीति तैयार किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. शालिनी श्रीवास्तव तथा तकनीकी सत्रों का संचालन अनुपम श्रीवास्तव ने किया। संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।