आगरालीक्स…आगरा में पहली बार डीप वेन थ्रोंबोसिस का सर्जरी से इलाज. उजाला सिग्नस रेनबो हॉस्पिटल में न्यूरोसर्जन डॉ. आरसी मिश्रा और डॉ. पल्लव गुप्ता ने जटिल सर्जरी और मैकेनिकल थ्रोंबोक्टोमी प्रोसीजर कर बचाई 18 वर्षीय युवक की जान
उजाला सिग्नस रेनबो हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने डीप वेन थ्रोंबोसिस का सर्जरी के माध्यम से उपचार कर 18 वर्षीय युवक की जान बचाई गई। रेडियोलॉजी विभाग के डॉ. पल्लव गुप्ता और उनकी टीम ने इस जटिल सर्जरी को अंजाम दिया, जिसमें पैरों की नसों में गांठें बन जाती हैं, सूजन और लालपन आ जाता है। जानकारी के अभाव और सही इलाज न मिलने पर इस बीमारी की वजह से काफी लोगों की जान चली जाती है।
ग्वालियर के रहने वाले 18 वर्षीय अतुल सिंह तोमर को सिर की गंभीर चोट के चलते उजाला सिग्नस रेनबो अस्पताल लाया गया था। एक जटिल सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम देकर डॉ. आरसी मिश्रा ने मरीज की जान बचाई। इसके बाद रेडियोलॉजी विभाग के डॉ. पल्लव गुप्ता को कलर डॉप्लर जांच के माध्यम से डीप वेन थ्रोंबोसिस का पता लगा। इस बीमारी में अक्सर खून को पतला करने की दवाएं दी जाती हैं लेकिन चूंकि मरीज की स्थिति पहले ही खराब थी, ब्लीडिंग के खतरे की वजह से यह दवाएं देना संभव नहीं था। डॉ. आरसी मिश्रा से बात करने के बाद डॉ. पल्लव ने मैकेनिकल थ्रोंबोक्टोमी प्रोसीजर को अंजाम दिया गया। इसमें हाथ के जरिए बिना चीरा लगाए एक बारीक सुई और तार पैरों तक पहुंचाई गई। इसके माध्यम से बड़ी—बड़ी गांठों को निकाला गया। लगभग दो घंटे तक चली सर्जरी के बाद मरीज अब पूरी तरह सुरक्षित है। पैरों में सूजन और कोई दर्द भी नहीं है। उसकी हालत में सुधार के बाद बुधवार को उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। डॉ. पल्लव गुप्ता ने वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ आरसी मिश्रा का आभार प्रकट किया, जिनके मार्गदर्शन में यह सर्जरी की गई।
क्या है डीप वेन थ्रम्बोसिस?
डॉ. पल्लव ने बताय कि पैरों में दो तरह की नसें होती हैं। एक तो जो स्किन के पास में होती हैं यानि ऊपरी सतह पर और दूसरी जो गहराई में होती हैं इन्हें डीप वेन्स कहते हैं। ये नसें लंग्स और हार्ट तक ब्लड दूषित सप्लाई का काम करती हैं। फिर हार्ट से यह ब्लड प्यूरीफाय होकर पूरी बॉडी में पहुंचाया जाता है। डीप वेन थ्रम्बोसिस होने पर पैरों की इन्हीं गहराई वाली नसों में खून के थक्के जम जाते हैं। यानी ब्लड क्लॉटिंग हो जाती है और दूषित ब्लड लंग्स और हार्ट तक नहीं पहुंच पाता इससे सूजन और दर्द होने लगता है। डीवीटी के 10% मरीजों में क्लॉटिंग लंग्स तक पहुंचकर फंस जाती है। इसके कारण मरीज सांस नहीं ले पाता और उसकी जान चली जाती है। अक्सर डीवीटी होने पर जानकारी के अभाव में लोग मसाज कर देते हैं इसके कारण क्लॉटिंग लंग्स में जाने का यह खतरा और बढ़ जाता है।
लक्षण
— दर्द
— सूजन
— फ्लशिंग
— सांस लेने में दिक्कत
— अनियमित दिल की धड़कन
— सीने में दर्द या बेचैनी जो आमतौर पर गहरी सांस लेने या खांसने से बदतर हो जाती है
— खूनी खांसी
— बहुत कम ब्लड प्रेशर
— चक्कर आना या बेहोशी