आगरालीक्स.. आगरा सहित देश भर में टेस्ट टयूब बेबी के लिए कराए जा रहा आईवीएफ फेल क्यों हो रहा है, इसे लेकर डॉ जयदीप मल्होत्रा ने दुनिया भर के चिकित्सकों से चर्चा की। डा. जयदीप मल्होत्रा ने भारत में आईवीफ और इससे जुड़ीं आधुनिक तकनीकों और परिस्थितियों के कुछ तथ्य दुनिया के सामने रखे। यूरोपियन सोसायटी आफ ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड एंब्रियोलाॅजी एशरे-2019 में पहली बार एक भारतीय सत्र आयोजित हुआ, जिसका नेतृत्व डा. जयदीप मल्होत्रा ने किया।
एशरे-2019 आईवीएफ और एंब्रियोलाॅजी का दुनिया में सबसे बड़ा सम्मेलन है। इस बार यह वियना, आस्ट्रिया में 23 से 26 जून 2019 तक आयोजित हुआ, जिसमें पूरी दुनिया से लगभग 12000 और भारत से 500 स्त्री रोग, आईवीएफ विशेषज्ञ और एंब्रियोलाॅजिस्ट शामिल हुए। इसमें आगरा से डा. जयदीप मल्होत्रा और डा. नरेंद्र मल्होत्रा ने भी सम्मेलन में शिरकत की और अलग-अलग विषयों पर व्याख्यान दिये। सम्मेलन में पहली बार एक भारतीय सत्र आयोजित हुआ, जिसका नेतृत्व करते हुए डा. जयदीप मल्होत्रा ने रिकरेंट आईवीएफ फेल्योर विषय पर प्रकाश डाला। कहा कि 40 साल पहले जब दुनिया में पहला परखनली शिशु पैदा हुआ तो निसंतान जोड़ों में आशा की किरण जगी कि अब संतान सुख के लिए निराश होने की जरूरत नहीं है, लेकिन आए दिन कई दंपतियों को बार-बार आईवीएफ करवाने के बावजूद विफलता हाथ लगने की शिकायतें रहती हैं। इसलिए यह जानना जरूरी है कि इसकी क्या वजहें होती हैं। अगर इन वजहों को जान लिया जाए तो आप एक अच्छे आईवीएफ केंद्र का चुनाव करते हैं जहां पारदर्शिता अधिक होती है, अच्छे उपकरण होते हैं, 24 घंटे भ्रूण की निगरानी की जाती है, अच्छे भ्रूण चुने जाते हैं आदि कई बिंदुओं के मिश्रण से गर्भधारण एवं संतान प्राप्ति की संभावना बढ़ जाती है। डा. नरेंद्र मल्होत्रा ने अपने व्याख्यान में कहा कि आज कॅरियर संवारने की ख्वाहिश रखने वाले युवा शादी करने या बच्चे पैदा करने में अक्सर देर कर देते हैं। कई बार यह देर बहुत अधिक हो जाती है। जबकि उम्र बढ़ने से पुरूष और महिलाओं दोनों के साथ संतानोत्पत्ति को लेकर समस्या पैदा होती है। 35 साल के बाद महिलाओं में अंडाणु बनने की क्षमता कम होने लगती है। इसी प्रकार पुरूष में शुक्राणुओं की गुणवत्ता भी आईवीएफ की सफलता के लिए अहम होती है। सम्मेलन के अंतर्गत सर्टिफिकेशन आॅफ एंब्रियोलाॅजी के लिए होने वाली परीक्षा में रेनबो हाॅस्पिटल की डा. सपना गांधी शामिल हुईं। गत वर्ष यह परीक्षा रेनबो हाॅस्पिटल के ही डा. केशव मल्होत्रा ने पास की थी। सम्मेलन में डा. जयदीप और डा. नरेंद्र के अलावा आगरा के कई अन्य चिकित्सक भी शामिल हुए।
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