
डॉ. गर्ग ने बच्चों को विज्ञान में नई खोज करने के लिए प्रोत्साहित करते हुए कहा कि अपने माइंड को पुराने नियम कायदों से सेट मत करिए। हम जो चीज रोज करते हैं देखते हैं, उसके बारे में भी नहीं सोचते। मसलन हमारे देश के लिए डामर की सड़क अच्छी है या फिर सीमेंटेड या आरसी की। सिर्फ टायर का फट जाना किसी चीज को रिजेक्ट नहीं कर सकता। उस समस्या को दूर करने का विकल्प खोजिए। आखिर आज भी हमारे गांव में 4-7 घंटे ही बिजली क्यों मिल रही है। हमारे मौहल्ले के नाले साफ क्यों नहीं है। समस्याओं को नजरअंदाज मत करिए। विज्ञानी बनना है तो खूब पढ़िए। और अपनी जीवन शैली को बेहतर बनाने के लिए सोचिए। तभी आपका और साथ में देश का विकास होगा।
कैम्प का शुभारम्भ डॉ. गर्ग एसीई कॉलेज के निदेशक डॉ. संयम अग्रवाल, चेयरमैन संजय गर्ग, सचिव अखिल गोयल व उमेश शर्मा ने मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप जलाकर किया। कैम्प में आगरा, फिरोजाबाद, शिकोहाबाद व टूंडला के 150 बच्चों ने भाग लिया और त में अपने जिज्ञासा भरे सवालों का जवाब भी पाया।
इवन-ऑड के नियम से हल नहीं होगी प्रदूषण की समस्या
देश में बढ़ते प्रदूषण की समस्या इवन-ऑड के नियम से खत्म नहीं होगी। यदि ऐसा होता तो पिछले शनिवार को दिल्ली में प्रदूषण का स्तर न बढ़ता। हमें प्रदूषण के कारणों पर गौर करना होगा। इस बात को ध्यान में रखना होगा कि कौन सा ईंधन और तकनीक प्रयोग की जा रही है। प्रदूषण के मामले में वाहनों की हिस्सेदारी मात्र लगभग 3 प्रतिशत है। यदि हम देश का विकास चाहते हैं तो ऊर्जा का उत्पादन और सही तरीके से खपत दोनों को बढ़ाना होगा। ऊर्जा विकास और प्रदूषण तीनों एक दूसरे से जुड़े हैं। इनमें संतुलन बैठाने का विकल्प ईवन-ऑड नम्बर की गाड़ियों का विकल्प नहीं है।
हमारे देश में 900 किलोवॉट प्रति व्यक्ति ऊर्जा (कुल 2 लाख 85 हजार मेगावॉट ऊर्जा प्रतिवर्ष) प्रतिवर्ष व्यय होती है। जो अन्य देशों के मुकाबले बहुत कम है। इससे हमारी जीवन शैली और विकास की गति प्रभावित होगी है। यदि हम देश की विकास दर को 7 प्रतिशत से ऊपर पहुंचाना चाहते हैं तो प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत को 1200 किलोवॉट प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष पर लाना होगा।
जबकि ईवन-ऑड के नियम उत्पादन पर असर डालेगा, जिसका सीधा प्रभाव विकास पर पड़ेगा। तकनीक के मामले में हम आज भी 20-25 साल पुराने ढर्रे पर काम कर रहे हैं। नई और बेहतर नशीनरी खरीदने में अधिक खर्च करने से डरते हैं, लेकिन इस बात पर गौर नहीं करते कि किस कीमत में कौन सी मशीनरी हमें कितना उत्पादन दे रही है।
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