
भु जगन्नाथ ने भक्तों को 15 दिन अंगराग यानी बीमार हो जाने के चलते भक्तों को दर्शन नहीं दिए थे। प्रभु दर्शन न हो पाने से उत्सुक भगवान राधा गोपनीनाथ, राधा दामोदर, राधा श्यामसुन्दर, मदनमोहन, गोविन्द देव, जगन्नाथ मंदिर आदि से भगवान जगन्नाथ, बलराम अपनी बहन सुभद्रा के साथ भव्य रथयात्रा पर विराजमान हो भ्रमण के लिए निकले। नगर के सभी मंदिरों से प्रभु के शोभायमान श्रीविग्रहों को वेद मंत्रोच्चारों के बीच सोने, चांदी एवं चंदन की लकड़ी से बने रथों पर विराजमान किया गया। झांज-मजीरों और शंखध्वनि के साथ विभिन्न स्थानों से निकाली गई प्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा के दौरान श्रद्धालुओं में उनके रथ को खींचने की होड़ सी मच गई।
भगवान के श्रीविग्रहों ने परंपरागत रूप से प्रसिद्ध ज्ञानगुदड़ी स्थान की परिक्रमा लगाकर अपने-अपने मंदिरों को प्रस्थान किया। राधादामोदर मंदिर के सेवायत कृष्णबलराम गोस्वामी ने बताया कि जगन्नाथ यात्रा महोत्सव भगवान कृष्ण के घर लौटने का पर्व है। पुरी से आई इस परंपरा को वृंदावन धाम ने अपनाया है। जगन्नाथ मंदिर के स्वामी ज्ञानप्रकाश पुरी महाराज ने कहा कि भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा आध्यात्मिक और भौतिक गति प्रदान करती है। वर्षों से चली आ रही यह धार्मिक परंपरा यहां धूमधाम से निभाई जा रही है।
रथ पर सवार भगवान जगन्नाथ सहित तीनों विग्रहों के साथ श्रीकृष्ण जन्मस्थान के प्रतीक चिन्ह और ध्वजा लिए दो अश्वारोही चल रहे थे। इसके पीछे भगवान की सवारी आने के सूचक ढोल, ताशा दल थे। बैंडों से निकल रही मधुर भक्तिपूर्ण संगीत की ध्वनियां लोगों को आनंदित कर रही थीं।
रथ यात्रा में शामिल हो रहे भक्त और साधु संत हरिबोल, जय जगन्नाथ का उच्चारण करते हुए चले। रथयात्रा में चैतन्य महाप्रभु, निताई-निमाई के युगल स्वरूप की झांकी सभी को आकर्षित कर रही थी। श्रीकृष्ण जन्मस्थान से शुरू होकर शहर के विभिन्न रास्तों से गुजरते हुए रथयात्रा श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर पहुंची। अनेक स्थानों पर रथयात्रा का फूल बरसाते हुए लोगों ने स्वागत किया।
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