
लेकिन कुछ कम्प्यूटर एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस एक लीप सेकंड की वजह से उन सिस्टम्स पर बेहद बुरा प्रभाव पड़ेगा जो दुनियाभर में इंटरनेट को पावर देते हैं। एक अंग्रेजी वेबसाइट के अनुसार, वैज्ञानिकों का तर्क है यह एक्स्ट्रा सेकंड इसलिए जरूरी है क्योंकि धरती के घूमने की रफ्तार एक दिन में एक सेकंड के दो हजारवें हिस्से के बराबर कम हो रही है और इसकी रफ्तार को एटोमिक टाइम के अनुसार करना जरूरी है।
एटोमिक टाइम की गणना परमाणु के अंदर होने वाली वाइब्रेशन से आंकी जाती है और इसे सबसे भरोसेमंद माना जाता है क्योंकि परमाणु अत्यंत संगत फ्रिक्वेंसिज पर रीजोनेट करते हैं। इस वजह से लीप सेकंड का उपयोग धरती के घूमने के समय को एटोमिक समय से मिलाए रखने के लिए किया जाता है। यह निर्णय हर बार तब लिया जाता है जब धरती का समय एटोमिक समय से आधा सेकंड पीछे हो जाता है इसलिए इसे कम की बजाय आधा सेकंड बढ़ा दिया जाता है।
नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के डेनियल मैकमिलन के अनुसार, डायनासोर काल में धरती का एक दिन 23 घंटे का होता था लेकिन 1820 में धरती को घूमने के लिए पूरे 24 घंटे लगने लगे। 1820 से मीन सोलर डे 2.5 मिलसेकंड बढ़ गया है। 1972 से लेकर 2015 तक में यह 26वीं बार होगा जब लीप सेकंड जोड़ा जाएगा।
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