आगरालीक्स… आगरा में भी समलैंगिक गे और लेस्बियन कम्युनिटी है, ये पति पत्नी की तरह रहकर यौन संबंध का आनंद ले रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद समलैंगिक जश्न मना रहे हैं।
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय खंडपीठ ने समलैंगिकता को अपराध बतानेवाली धारा 377 को खत्म कर दिया है। अब समलैंगिकता अपराध नहीं माना जाएगा। इसके बाद मेट्रो शहरों सहित आगरा की एलजीबीटी (लेस्बियन गे, बाईसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर) कम्युनिटी में जश्न का माहौल है। आगरा में भी बडी संख्या में लेस्बियन और गे हैं, युवतियां युवतियों लेस्बियन के साथ यौन संंबंध बना रहीं हैं और पुरुष पुरुषों के साथ संबंध बना रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि समलैंगिक व्यक्ति को बदलना नहीं जा सकता है, उसका अपने ही सेक्स के प्रति लगाव होता है, समलैंगिक प्यार करने के साथ यौन संबंध का आनंद भी पति पत्नी की तरह से ही लेते हैं।
25 फरवरी 2016 ताजमहोल्व में हुआ था एलजीबीटी का फैशन शो

ताजमहोत्सव में 25 फरवरी 2016 को आगरा के अनूठे फैशन शो को देखने के लिए भीड उमड पडी, हाई पिच म्यूजिक के बीच एलजीबीटी (लेस्बियन गे, बाईसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर) ने रैंप पर कैटवॉक किया। साथ ही संदेश दिया कि एवरी हृयूमन हैव राइट।
सदर बाजार में रात को सतरंगी लाइट और हाई पिच म्यूजिक के बीच लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर ने रैंप पर कैट वॉक किया तो सब देखते रहे गए। यहां आगरा के साथ दिल्ली से आए एलजीबीटी ने हिस्सा लिया। एसिड अटैक सर्वाइवर्स के शिरोज हैंगआउट के फैशन कंसल्टेंट अतुल कुमार के एलजीबीटी कम्युनिटी के लिए तैयार किए गए रेनबो कलेक्शन को पहनकर एक के बाद एक एलजीबीटी ने कैट वॉक किया।
शो में न्यूजीलैंड, दिल्ली, बंगलूरू से आए 20 समलैंगिक युवकों ने चार राउंड में अपने परिधानों का प्रदर्शन किया। इन समलैंगिक जोड़ों में भारतीय मूल के पेंटर बलवीर अपने पार्टनर माइक उर्फ किशन के साथ आए। विकलांग बलवीर व्हील चेयर पर मंच पर आए तो संचालक ने उनका परिचय कराया।
शो को देखने के लिए अमूमन खाली पड़ी रहने वाली सदर बाजार की दर्शक दीर्घा खचाखच भरी हुई थी। दर्शकों में युवाओं के साथ काफी संख्या में महिलाएं और युवतियां भी शामिल थीं। पांच राउंड में हुए फैशन के तीसरे चरण में श्रीलंका से आईं पांच मॉडल्स ने परिधानों का प्रदर्शन किया। इस अनोखे फैशन शो की फोटोग्राफी करने के लिए इटली से फ्रेडरिको भी आए। ड्रेस डिजाइन अतुल कुमार, प्रिया बंसल और शालू जैन ने किए। कोरियोग्राफर रिवाज संस्था की अंशिका सक्सेना ने दर्शकों का शुक्रिया किया। संचालन नीलेंद्र श्रीवास्तव ने किया।
लाइफ गेट बेटर टुगेदर
एलजीबीटी को नया नाम दिया गया है, उन्होंने एलजीबीटी को मतलब लाइफ गेट बेटर टुगेदर साथ रहने से जीवन अच्छा होता है से बयां किया। एडस के साथ ही एलजीबीटी को समाज में समान अधिकार की बात उठाई।
रोड टू इक्युअलिटी हेज नेवर बीन स्ट्रेट
एलजीबीटी ने यह संदेश भी दिया कि समानता ही राह आसान नहीं है, इसके लिए तमाम समस्याएं हैं, समाज में एलजीबीटी को गलत नजर से देखा जाता है, जबकि वे भी इंसान हैं और अपने समलैगिंग साथी के साथ बेहतर जिंदगी जी रहे हैं।
अब समलैंगिकता अपराध नहीं माना जाएगा।

6 सितंबर 2018 को मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय खंडपीठ ने समलैंगिकता को अपराध बतानेवाली धारा 377 को खत्म कर दिया है। अब समलैंगिकता अपराध नहीं माना जाएगा।
पांच जजों की संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा शामिल हैं।
शुरुआत में संविधान पीठ ने कहा था कि वो जांच करेंगे कि क्या जीने के मौलिक अधिकार में ‘यौन आजादी का अधिकार’ शामिल है, विशेष रूप से 9-न्यायाधीश बेंच के फैसले के बाद कि ‘निजता का अधिकार’ एक मौलिक अधिकार है।
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय खंडपीठ ने समलैंगिकता को अपराध बतानेवाली धारा को खत्म कर दिया है। जिसके बाद अब समलैंगिकता अपराध नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने जुलाई माह में इस मुद्दे पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। आइये जानते हैं इससे जुड़ी हुई दस बातें-
कोर्ट ने कहा था कि यह दो समलैंगिक वयस्कों द्वारा सहमति से बनाए गए यौन संबंध तक ही सीमित रहेगा। पीठ ने कहा कि अगर धारा-377 को पूरी तरह निरस्त कर दिया जाएगा तो आरजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। हम सिर्फ दो समलैंगिक वयस्कों द्वारा सहमति से बनाए गए यौन संबंध पर विचार कर रहे हैं. यहां सहमति ही अहम बिन्दु है।
-पीठ ने कहा, ‘मौलिक अधिकारों का पूरा उद्देश्य है कि यह अदालत को निरस्त करने का अधिकार देता है। हम बहुमत वाली सरकार द्वारा कानून को निरस्त करने का इंतजार नहीं कर सकते. अगर कानून असंवैधानिक है तो उस कानून को निरस्त करना अदालत का कर्तव्य है।
2009 से चल रहा मामला
2 जुलाई 2009 को दिल्ली हाईकोर्ट ने नाज फाउंडेशन की याचिका पर धारा 377 को अंसवैधानिक करार दिया था। इस मामले में पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी और फिलहाल पांच जजों के सामने क्यूरेटिव बेंच में मामला लंबित है। सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर 2013 को सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए समलैंगिकता को अपराध माना था।