आगरालीक्स…आगरा के मेलों में दिखने वाली वो 10 चीजें जो या तो गायब हो गईं या धीरे-धीरे होती जा रही हैं, कुछ पर सरकार सख्त हुई तो कुछ बेरुखी की भेंट चढ़ीं, बल्केश्वर मेले से इनकी तस्वीरें भी देखिए

आगरा में श्रावण मास के हर सोमवार को मेले का आयोजन होता है। चारों कोनों पर विराजमान भगवान शिव की लाखों भक्त पूजा अर्चना करते हैं और मेले भी एक बड़ी परम्परा हैं। मगर विगत कुछ वर्षों में मेले का स्वरूप काफी बदला है। आज आप कुछ ऐसी चीजों के बारे में जानेंगे जो कभी इन मेलों की शान हुआ करती मगर समय के साथ या तो गायब हो गईं या बहुत कम ही बची हैं।
सर्कस
आगरा में सर्कस कभी मेलों की शान हुआ करते थे। बल्केश्वर के बड़े पार्क में तो एक बड़ा सर्कस लगता था जो मेले से महीनों पहले ही आ जाता था। साल 2000 में सर्कस में जानवरों का खेल दिखाने पर केंद्र सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया जिसकी वजह से लोगों में सर्कस देखने की उत्सुकता भी काफी कम हो गई। अब कई सालों से यहां सर्कस नही लगा है। आज के बच्चों ने भी इसे टीवी या मोबाइल में ही देखा है।
चिड़ियाघर
पहले के लोग बताते हैं कि आगरा में लगने वाले इन मेलों में अस्थाई चिड़ियाघर भी लगा करते थे। इनमें शेर, चीतों, भालू को देखने के लिए डोर दराज से लोग आया करते थे मगर इसके खतरों और जानवरों के प्रति क्रूरता को देखते हुए सरकार ने इस पर भी पाबंदी लगा दी।
मौत का कुआं
मौत का कुआं मेलों में दिल दहलाने और रौंगटे खड़े कर देने वाला मगर सबसे अधिक देखा जाने वाला खेल हुआ करता था। इसमें स्टंटमैन कुए की दीवारों पर बाइक घुमाया करते थे। बाद में यह बाइक एक से दो, दो से चार हुईं और फिर कारों ने भी अपनी जगह बना ली। एक साथ कई कारें और बाइक कुए में चलने से जोखिम काफी बढ़ गया। कई जगह स्टंटमैन के बैलेंस खो देने की वजह से घटनाएं भी हुईं। सरकार की अब इस खेल पर भी सख्ती है।
डांस पार्टी
आगरा में लगने वाले इन मेलों में कभी डांस पार्टी भी आया करती थीं। दूर दूर से गाने-बजाने वाले आकर दर्शकों का खूब मनोरंजन करते थे। बाद में कई जगह से अश्लीलता या फूहड़ गानों की शिकायतें आने लगीं और डांस पार्टी भी लगभग गायब हो गईं।
खजला
आम तौर पर मेलों में आने वाले खजला जरूर खरीदते थे। बताया जाता है मुख्य रूप से यह कानपुर का उत्पाद है मगर पहले आगरा और भरतपुर में भी काफी खाया जाता था। मेले में कई व्यापारी खजला का स्टाल लेकर आते थे मगर अब इक्का-दुक्का ही बचे हैं। बल्केश्वर मेले में रमेश पिछले 20 साल से खजला की स्टाल लगा रहे हैं। वे बताते हैं कि पहले उनके दादी जी स्टाल लगाया करते थे और वे छोटे थे तो उनके साथ आया करते थे।
काठगाड़ी-हाथगाड़ी
काठगाड़ी लकड़ी से बना हुआ बच्चों का एक खिलौना है जिसे बच्चे हाथ से चलाते हैं। बहुत छोटे बच्चे तीन पहियों वाली काठगाड़ी से चलना भी सीख जाते हैं क्योंकि यह बैलेंस बनाना सीखने में मदद करती है। इस मेलों से यह काठगाड़ी अब विलुप्त होने के कगार पर है और उनकी जगह आधुनिक खिलौनों ने ले ली है।

नौंन खटाई
नौंन खटाई बिस्किट की एक प्रकार है। यह आटे, मैदा, बेसन कई तरह से बनाई जाती है। आम तौर पर कहीं भी मिल जाने वाला पदार्थ है लेकिन मेलों में इसकी भरमार हुआ करती थी। अब कम ही नजर आया करती है। आज पिज़्ज़ा और बर्गर के दीवाने बच्चों को इस इंडियन बिस्किट का जायका जरा भी पसंद नही आता। बल्केश्वर मेले में दुकान लगाने वाले रामदीन कहते हैं कि नौंन खटाई की बिक्री कम हो रही है। बच्चे मेलों में फास्ट फूड खा रहे हैं।
मिट्टी के बर्तन और खिलौने
मेलों में पहले मिट्टी के बर्तन, खिलौनों के स्टॉल बड़ी संख्या में हुआ करते थे। मगर अब बमुश्किल ही नजर आते हैं। अब मैटल के बर्तन ही ज्यादा खरीदे जाते हैं। आस पास में यह काम करने वाले कुम्हार भी कम ही बचे हैं।

चीनी मिट्टी का सामान
चीनी मिट्टी के बर्तन और खिलौने आकर्षण होते थे। अब मेलों में यह भी कम ही दिखाई देते हैं। एक कारीगर राजकुमार ने बताया कि प्लास्टिक की चीजें ज्यादा खरीदी जाती हैं। चीनी मिट्टी के खरीददारी कम बचे हैं। ऐसे में यह कारोबार भी दम तोड़ देगा। इन्हें बनाने में लागत और मेहनत ज्यादा है, खरीददार कम।

तेलहिया जलेबी
मेले में धूम मचाने वाली तेलहिया जलेबी का भी जलवा दिखना बंद हो गया है। हर मेले में हर तरफ गुड़ तेल से निर्मित तेलहिया जलेबी की दुकानें देखते ही बनती थीं। बुजुर्गो का कहना है कि इस जलेबी की लोकप्रियता सैकड़ों सालों से बरकरार रही मगर अब गायब हो रही है। क्या गरीब क्या अमीर सभी इसका रसास्वादन करते थे।