आगरालीक्स…आगरा में आसमान से आग बरसना कब बंद होगा इसका लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, इस बीच बुजुर्गों से दिलचस्प बातचीत, कुछ साल पहले तक कैसे कटते थे दिन और रात, जेन—जी जरूर जानें
आगरा में आसमान से आग बरसना कब बंद होगा, इसका लोग ब्रेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। 80 और 90 के दशक में आगरा में एसी का उपयोग इतना अधिक नहीं था। कूलर भी कुछ ही घरों में हुआ करते थे। तब अधिकांश घरों में लोग गर्मी से बचने के लिए प्राकृतिक और पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करते थे। आगरा में डॉ. नवीन गुप्ता, बिहेवियर साइंटिस्ट एंड लाइफ कोच हैं। वे सेंटर फॉर सेल्फ एंड कॅरियर डवपलमेंट भी चलाते हैं। डॉ. गुप्ता बताते हैं कि उनके पास आए दिन ऐसे मामले आते हैं जिनमें लोग आइसोलेशन की ओर जा रहे हैं। 'एसी कल्चर' भी इसका एक बड़ा कारण है। इससे सामाजिक और मानसिक अलगाव भी पैदा हो रहा है। अपने ही आस—पास देखेंगे तो पाएंगे कि घरों के अंदर कैद होकर लोग मशीनों के बीच जीने लगे हैं। इससे वे अकेलेपन के शिकार हो रहे हैं, जबकि पहले ऐसा नहीं था। पहले लोग अपनी दिनचर्या को बदलते थे, दोपहर में आराम करते थे और रात को खुले में सोते थे।स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रकाश नारायण शिरोमणि के स्वजन शशि शिरोमणि अब 90 वर्ष के हैं और बालूगंज में रहते हैं। वे बताते हैं कि उस समय हमारा परिवार पीपल मंडी में था। मकानों की बनावट, पेड़—पौधों की अधिकता आदि की वजह से उस समय धूप और लू का प्रभाव कम था। पुराने बाजारों वाला आगरा और भवनों की बनावट ऐसी कि संकरी गलियां तक ठंडी रहती थीं। नहाने के लिए यमुना नदी का सहारा था। लोग घरों में कम और घाटों पर स्नान अधिक किया करते थे। इससे सुबह—शाम ताजगी का अहसास होता था। बाद में पीपल मंडी क्षेत्र में ही नल की टोंटियां लगवाकर नहाने का सिलसिला शुरू हुआ। इसलिए इसे 12 टोंटी का चौराहा भी कहा गया।
लोकस्वर संस्था के अध्यक्ष राजीव गुप्ता विजय नगर कॉलोनी में रहते हैं और वे अब 65 वर्ष के हैं। उन्होंने बताया कि पुराने घरों की दीवारें मोटी होती थीं और अधिकांशत: मिट्टी से बनाई जाती थीं ताकि बाहर की गर्मी अंदर न आ सके। कमरों में ऊंची छतें होती थीं और बड़े रोशनदान बनाए जाते थे ताकि गर्म हवा ऊपर उठकर बाहर निकल जाए और ठंडी हवा अंदर आए। खिड़कियों और दरवाजों पर खस, बांस या खजूर के पत्तों की चटाइयां लगाई जाती थीं। इन पर पानी छिड़कने से अंदर आने वाली हवा ठंडी और महकदार हो जाती थी। अब ऐसा नहीं है। मकान रिस्की हो गए हैं। हम मकान के हर कोने का इस्तेमाल करने की चाहत में उन्हें माचिक की डिबियों सा पैक करा रहे हैं। अगर कोई जगह खुली रह भी जाए तो उसे कांच लगाकर हवा का अवागमन तक रोक दे रहे हैं।
विजय नगर कॉलोनी निवासी वरिष्ठ अधिवक्ता और पर्यावरण प्रेमी केसी जैन कहते हैं कि दोपहर के समय, लोग अपने घरों के आंगन में या खेतों में बड़े-बड़े पेड़ों की ठंडी छांव में बैठकर समय बिताते थे। बिजली न होने पर हाथ के पंखों का इस्तेमाल किया जाता था। शरीर को हाइड्रेटेड और ठंडा रखने के लिए मटके का पानी, सत्तू, शिकंजी, छाछ और बेल का शरबत पिया जाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। छाता, अंगोछा, सूती कपड़े जैसे गायब ही हो गए हैं। घर के दरवाजों पर खेंचू हुआ करते थे और हर कॉलोनी या मोहल्ले में कुंआ होता था। ये सब अब गायब हो चुका है।
अवकाश प्राप्त अपर जनपद न्यायधीश प्रवीण कुमार बताते हैं कि हम तकनीक को नजरअंदाज नहीं करते क्योंकि इसके नुकसान हैं तो फायदे भी हैं। मगर इसे नियंत्रित किया जा सकता है। अब शहरों का कल्चर ऐसा हो चुका है कि लोग घरों के भीतर रहना पसंद कर रहे हैं, लेकिन इसका दुष्परिणाम भी है। मेल—मिलाप और बातचीत कम हो गई है। लोग आइसोलेशन की ओर जा रहे हैं। पहले भी लोग भीषण गर्मी से बचने के लिए दोपहर के समय घर के अंदर सोते या आराम करते थे। गांवों में लोग छतों पर और बाहर दल्लानों में चारपाई को ठंडे पानी से धोकर या गीली चादर बिछाकर सोते थे। इससे आपस में बातचीत भी होती थी, लेकिन अब एसी के जमाने में लोगों ने खुद को कमरों में कैद कर लिया है।