आगरालीक्स..आगरा में पौधरोपण करना पहले होता था सामाजिक जिम्मेदारी। मंदिर-बगीचियों में गूलर-पीपल के पौधे रोप कर दी जाती थी पूर्वजों को श्रद्धांजलि। क्या आपको याद है…आज विश्व पर्यावरण दिवस है।

सभी वर्गो में पौधों को संरक्षित करने की थी ललक
पौधरोपण करना और उन्हें संरक्षित कर वृक्षों में तब्दील करना एक समय में सभी वर्गों के लोगों की सामाजिक जिम्मेदारी होती थी। इसके लिए समय-समय पर मंदिर, बगीचियों और यमुना किनारे पौधरोपण किया जाता था।
पुरखों की स्मृति और पितृ शांति भी
पुरखों की याद में और पितृ शांति के लिए भी गूलर, पीपल के पेड़ लगाना सामाजिक जिम्मेदारी के साथ उत्सव के रूप में भी होती थी। इसके तहत परिवार का मुखिया सामान्य परिवार से है तो वह मंदिर बगीचियों में गूलर-पीपल के पौधे लगाते थे और बड़े होने पर उनकी पूजा की जाती थी।
उत्सव की तरह लगाए जाते थे गूलर-पीपल
परिवार का मुखिया सम्पन्न होता था गूलर-पीपल के पौधे लगाने के लिए उत्सव का आयोजन करता था, जिसमें खानदान की सभी बहन-बेटियों और पुरुष सदस्यों के साथ बस से गंगा स्नान सोरोंजी, हरिद्वार, रामघाट आदि गंगा घाटों को जाते थे और वहां स्नान कर पितृ शांति को गूलर-पीपल लगाए जाते थे। दावत दी जाती थी और घर आकर भी मंदिर बगीचों में भी इन पौधों को लगाया जाता था। अब कुछ ही लोग इस परंपरा का पालन कर रहे हैं।
जल-जंगल और जमीन का पर्यावरण संतुलन की धुरी
युवा पीढ़ी को एक बार फिर इस संबंध में जागरूक होना होगा क्योंकि जल-जंगल और जमीन का पर्यावरण संतुलन की धुरी होती है। आगरा में जंगल तो सिमट कर रह गए हैं। जल की स्थिति से सभी लोग भलिभांति परिचित हैं, वह तो भला हो गंगाजल का वह लोगों की प्यास बुझा रहा है। जमीन भी पानी की कमी से बंजर हो रही है।