हाथरसलीक्स..(अंकुर पंडित) अयोध्या में विवादित ढांचे पर मालिकाना हक को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। 17 नवंबर से पहले सुप्रीम कोर्ट देश के सबसे पुराने विवाद पर अपना अहम फैसला सुनाएगा। फैसले को लेकर जहां हिंदू और मुस्लिम पक्ष के लोगों में बेचैनी बढ़ती जा रही हैं वहीं यूपी के हाथरस जिले के 12 गांवों के करीब 30 हजार हिंदू और मुसलमान फैसले को लेकर बेफिक्र नजर आ रहे हैं। इन लोगों का दोनों धर्मों से गहरा नाता रहा है। इनका कहना है कि मंदिर बने या मस्जिद, कोर्ट का हर फैसला इन्हें खुशी देगा।
परसारा, पैकवाड़ा, नगला खिरनी, नगला कृपा, कुम्हरई, अल्हैपुर चुरसैन, सूजिया, सुजानपुर समेत दर्जनभर गांवों में 30 हजार की मिश्रित आबादी रहती है। शहर से करीब आठ किलोमीटर दूर स्थित ये गांव मजहबी एकता की मिसाल बने हुए हैं। यहां रहने वाले ज्यादातर लोग हिंदू—मुसलमान हैं, बावजूद इसके सांप्रदायिक झगड़े का कभी कोई इतिहास नहीं रहा है। गांव के बुजुर्गों की माने तो भविष्य में भी ऐसे किसी झगड़े की आशंका नहीं है।

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धर्म परिवर्तन के कारण दोनों धर्मों में गहरी आस्था
दरअसल, इन गांवों में रहने वाले ज्यादातर लोगों के पूर्वज धर्मपरिवर्तन कर हिंदू या मुसलमान बने थे। धर्मपरिवर्तन के कारण गांवों के लोगों को दोनों धर्मों को समझने का मौका मिला और मजहबी कट्टरता दूर हो गई। यही वजह है कि इस गांव में हिंदू—मुस्लिम के बीच की खाई उतनी गहरी नहीं है जितनी दूसरी जगहों पर नजर आती है। गांव के 74 वर्षीय प्रताप सिंह राना कहते हैं, यह सभी गांव राजपूतों के हैं। सैंकड़ों वर्ष पहले हमारे पूर्वजों ने मुस्लिम धर्म अपनाया था। इनमें से कुछ के वंशजों ने 100 साल बाद हिंदू धर्म में वापसी कर ली। कुछ ने 200 साल बाद की। हमारे पूर्वज ने 100 साल पहले हिंदू धर्म अपनाया। हालांकि ज्यादातर लोग मुसलमान ही बने रहे। दोनों ही धर्मों के लोगों में कुछ पंरपराएं और रीति रिवाज एक जैसे हैं। जो हमें दूसरे हिंदू—मुसलमानों से अलग करते हैं। हमारे गोत्र एक जैसे हैं। हम भी नाम के पीछे राना लिखते हैं और मुसलमान भी गहलौत, राना आदि लगाते हैं। राना मुसलमान भी समान गोत्र में शादी नहीं करते। प्रताप सिंह राना कहते हैं, हमारे गांव परसारा में चार मंदिर और तीन मस्जिद हैं। मंदिर वालों को मस्जिद वालों से वैर नहीं और मस्जिद वालों को मंदिर वालों से कोई शिकवा नहीं।
इसलिए यहां मंदिर बने या मस्जिद, दोनों ही फैसलों से खुशी होगी।
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एक भाई हिंदू और दूसरा मुसलमान !
इन गांवों में कुछ परिवार ऐसे भी हैं जहां संप्रदाय चुनने की आजादी है। इन परिवारों में मुस्लिम पिता का बेटा हिंदू धर्म अपना सकता है। एक भाई हिंदू तो दूसरा मुस्लिम धर्म को अपनाकर जीवन व्यतीत कर सकता है। ऐसी धार्मिक आजादी शायद ही कहीं देखने को मिलती हो। प्रताप सिंह राना कहते हैं, पहले इन परिवारों की संख्या कुछ ज्यादा थी लेकिन हमारे गांव में ऐसे चार—छह परिवार ही बचे हैं, जहां परिवार के सदस्यों को मजहब चुनने की आजादी है।
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