आगरालीक्स… ( 11 April ) । चैत्र नवरात्र इस बार कब से कब तक हैं। कौन-कौन से दिन किस देवी माता के स्वरूप की पूजा करनी होगी। किस तरह से पूजा करनी हैं। घट स्थापना समेत आसान पूजा विधि समेत सभी विषयों की विस्तृत जानकारी आगरालीक्स में।
श्री गुरु ज्योतिष संस्थान अलीगढ़ के अध्यक्ष एवं ज्योतिषी पं. ह्रदय रंजन शर्मा के मुताबिकइस बार देवी मां अपने भक्तों के यहां घोड़े पर सवार होकर आएंगी। नवरात्र की समाप्ति पर दशमी के दिन नर वाहन पर सवार होकर देवलोक में वापस लौट जाएंगी।
चौघड़िया मुहूर्त अनुसार घटस्थापना के उत्तम मुहूर्त
-13 अप्रैल मंगलवार को प्रातः 9:10 से लेकर दोपहर 2:00 तक विश्व प्रसिद्ध चौघड़िया मुहूर्त अनुसार चर ,लाभ और अमृत के तीन सुप्रसिद्ध चौघड़िया मुहूर्त उपलब्ध होंगे। नौकरीपेशा एवं बीमारों के लिए अति शुभ।
-दिवाकाल 3:30 से शाम 05:20 तक शुभ चौघड़िया महूर्त व्यापारियों, जिन बच्चों के विवाह शादी एवं परीक्षाओं में दिक्कत परेशानी का समय है, उन लोगो के लिए इस शुभ समय में घट स्थापना।
घट स्थापना कैसी करनी चाहिए
नवरात्र में घट स्थापना का बहुत महत्त्व है। कलश को सुख समृद्धि, ऐश्वर्य देने वाला तथा मंगलकारी माना जाता है। कलश के मुख में भगवान विष्णु गले में रूद्र , मूल में ब्रह्मा तथा मध्य में देवी शक्ति का निवास माना जाता है। नवरात्र के समय ब्रह्माण्ड में उपस्थित शक्तियों का घट में आह्वान करके उसे कार्यरत किया जाता है
-इससे घर की सभी विपदादायक तरंगें नष्ट हो जाती हैं। घर में सुख-शांति तथा समृद्धि बनी रहती है
घट स्थापना की सामग्री
जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र जौ बोने के लिए शुद्ध साफ़ की हुई मिट्टी पात्र में बोने के लिए जौ ( गेहूं भी ले सकते है ), घटस्थापना के लिए मिट्टी का कलश या फिर तांबे का कलश भी लें सकते है, कलश में भरने के लिए शुद्ध जल, गंगाजल, रोली , मौली, पूजा में काम आने वाली साबुत सुपारी,कलश में रखने के लिए सिक्का, आम के पत्ते, कलश ढकने के लिए ढक्कन, ढक्कन में रखने के लिए साबुत चावल, नारियल, लाल कपडा, फूल माला,फल तथा मिठाई ,दीपक , धूप , अगरबत्ती
घट स्थापना की विधि
-सबसे पहले जौ बोने के लिए एक ऐसा पात्र लें जिसमे कलश रखने के बाद भी आस पास जगह रहे। यह पात्र मिट्टी की थाली जैसा कुछ हो तो श्रेष्ठ होता है। इस पात्र में जौ उगाने के लिए मिट्टी की एक परत बिछा दें। मिट्टी शुद्ध होनी चाहिए । पात्र के बीच में कलश रखने की जगह छोड़कर बीज डाल दें। फिर एक परत मिटटी की बिछा दें। एक बार फिर जौ डालें। फिर से मिट्टी की परत बिछाएं। अब इस पर जल का छिड़काव करें
-कलश तैयार करें। कलश पर स्वस्तिक बनायें। कलश के गले में मौली बांधें। अब कलश को थोड़े गंगा जल और शुद्ध जल से पूरा भर दें
-कलश में साबुत सुपारी , फूल डालें। कलश में सिक्का डालें। अब कलश में पत्ते डालें। कुछ पत्ते थोड़े बाहर दिखाई दें इस प्रकार लगाएँ। चारों तरफ पत्ते लगाकर ढ़क्कन लगा दें। इस ढ़क्कन में अक्षत यानि साबुत चावल भर दें
-नारियल तैयार करें। नारियल को लाल कपड़े में लपेट कर मौली बांध दें। इस नारियल को कलश पर रखें। नारियल का मुंह आपकी तरफ होना चाहिए। यदि नारियल का मुंह ऊपर की तरफ हो तो उसे रोग बढ़ाने वाला माना जाता है। नीचे की तरफ हो तो शत्रु बढ़ाने वाला मानते है, पूर्व की और हो तो धन को नष्ट करने वाला मानते है। नारियल का मुंह वह होता है जहाँ से वह पेड़ से जुड़ा होता है । अब यह कलश जौ उगाने के लिए तैयार किये गये पात्र के बीच में रख दें
देवी मां की चौकी की स्थापना और पूजा विधि
-लकड़ी की एक चौकी को गंगाजल और शुद्ध जल से धोकर पवित्र करें।
-साफ कपड़े से पोंछ कर उस पर लाल कपड़ा बिछा दें।
-इसे कलश के दांयी तरफ रखें।
-चौकी पर मां दुर्गा की मूर्ति अथवा फ्रेमयुक्त फोटो रखें।
– मां को लालचुनरी ओढ़ाएँ और फूल माला चढ़ाएँ।
-धूप, दीपक आदि जलाएं।
-नौ दिन तक जलने वाली माता की अखंड ज्योति जलाएं। न हो सके तो सिर्फ पूजा के समय ही दीपक जला सकते हैं।
-देवी मां को तिलक लगाएं।
-माँ दुर्गा को वस्त्र, चंदन, सुहाग के सामान यानि हल्दी, कुमकुम, सिंदूर, अष्टगंध आदि अर्पित करें ,काजल लगाएं
-मंगलसूत्र, हरी चूडियां, फूल माला, इत्र, फल, मिठाई आदि अर्पित करें।
-प्रतिदिन श्रद्धानुसार दुर्गा सप्तशती के पाठ , देवी मां के स्रोत ,दुर्गा चालीसा का पाठ, सहस्रनाम आदि का पाठ करें या सुनें।
-फिर अग्यारी तैयार कीजिये।
-एक मिटटी का पात्र और लीजिये उसमे आप गोबर के उपले को जलाकर अग्यारी जलायें घर में जितने सदस्य हैं, उन सदस्यों के हिसाब से लोंग के जोडे बनायें। लोंग के जोड़े बनाने के लिए आप बताशो में लोंग लगाएं यानि कि एक बताशे में दो लोंग ये एक जोड़ा माना जाता है और जो लोंग के जोड़े बनाये है फिर उसमे कपूर और सामग्री चढ़ाये और अग्यारी प्रज्वलित करें।
-प्रतिदिन देवी मां की सपरिवार आरती करें।
-पूजन के उपरांत वेदी पर बोए अनाज पर थोड़ा सा जल अवश्य छिड़कें।
-रोजाना देवी माँ का पूजन करें तथा जौ वाले पात्र में जल का हल्का छिड़काव करें। जल बहुत अधिक या कम ना छिड़कें ।
नवरात्र व्रत की पूजा विधि
-नवरात्र के दिनों में बहुत से लोग आठ दिनों के लिए व्रत रखते हैं (पड़वा से अष्टमी) और केवल फलाहार पर ही रहते हैं। फलाहार का अर्थ है, फल एवं और कुछ अन्य विशिष्ट सब्जियों से बने हुए खाने. फलाहार में सेंधा नमक का इस्तेमाल होता है। नौवें दिन भगवान राम के जन्म की रस्म और पूजा (रामनवमी) के बाद ही उपवास खोला जाता है,
जो लोग आठ दिनों तक व्रत नहीं रखते, वे पहले और आख़िरी दिन उपवास रख लेते हैं (यानी कि पड़वा और अष्टमी को).व्रत रखने वालो को जमीन पर सोना चाहिए।
-नवरात्र व्रत में अन्न खाना निषेध है।
-सिंघाडे के आटे की लप्सी, सूखे मेवे, कुटु के आटे की पूरी, समां के चावल की खीर, आलू ,आलू का हलवा भी लें सकते है। ,दूध ,दही ,घीया ,इन सब चीजो का फलाहार करना चाहिए और सेंधा नमक तथा काली मिर्च का प्रयोग करना चाहिए | दोपहर को फल भी लें सकते है।
नवरात्र में कन्या पूजन
-महा अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन किया जाता है। कुछ लोग अष्टमी के दिन और कुछ नवमी के दिन कन्या पूजन करते है। परिवार की रीति के अनुसार किसी भी दिन कन्या पूजन किया जा सकता है।
-तीन साल से नौ साल तक आयु की कन्याओं को तथा साथ ही एक लांगुरिया (छोटालड़का ) को खीर , पूरी , हलवा , चने की सब्जी आदि खिलाये जाते हैं। कन्याओं को तिलक करके, हाथ में मौली बांधकर,गिफ्ट दक्षिणा आदि देकर आशीर्वाद लिया जाता है, फिर उन्हें विदा किया जाता है।
चैत्र नवरात्र के शुभ दिन व तिथियां

-नवरात्र दिन 1 (प्रतिपदा) घटस्थापना : मां शैलपुत्री पूजा, 13 अप्रैल (मंगलवार)।
– नवरात्र दिन 2 (द्वितीया) मां ब्रह्मचारिणी पूजा, 14 (बुधवार)।
-नवरात्र दिन 3 (तृतीया) मां चंद्रघंटा पूजा,15 अप्रैल (गुरुवार)।
-नवरात्रि दिन 4 (चतुर्थी) मां कूष्मांडा पूजा 16अप्रैल (शुक्रवार)।
-नवरात्र दिन 5 (पंचमी) मां स्कंदमाता 17अप्रैल (शनिवार)।
-नवरात्र दिन 6 (षष्ठी )मां कात्यायनी पूजा, 18अप्रैल (रविवार)।
-नवरात्र दिन 7 (सप्तमी) मां कालरात्रि पूजा,19 अप्रैल (सोमवार)।
-नवरात्र दिन 8 (अष्टमी) मां महागौरी, दुर्गा महा अष्टमी पूजा, दुर्गा 20 अप्रैल (मंगलवार)।
-नवरात्र दिन 9 (नवमी) मां सिद्धिदात्री नवरात्रि पारणा 21 अप्रैल (बुधवार)।
-नवरात्र दिन 10 (दशमी) दुर्गा विसर्जन, 22अप्रैल (गुरुवार)।