आगरालीक्स…सुख समृद्धि देता है दीपावली पंचमहापर्व. जानें इन पंचोत्सव के पांचों दिन का महत्व और पूजन
समृद्धि का मुख्य पर्व है दीपावली पंचमहापर्व,विशालतम संस्कृति से युक्त भारत भूमि मानव जीवन को संवारने की अद्वितीय परम्पराओं से युक्त हैं। जहाँ ऋतुओं के अनुसार प्रसिद्ध तिथि, त्यौहारों का आगमन होता रहता है, जो जल की धारा की तरह प्रवाहित होते रहते हैं तथा अपवित्र और आतृप्त, जीवन पथ पर हारे और थके व आकुल-व्याकुल प्राणियों को पवित्र व तृप्त करते रहते हैं। ऐसी महानतम संस्कृति जो सम्पूर्ण विश्व के लिए पथ प्रदर्शक के रूप में सनातन धर्मी है, उससे भारत ही नहीं अपितु समूचा विश्व भी अभिभूत होने को उत्सुक है। इन पंच महापर्वों का क्या महत्व एवं अस्तित्व है। इनके पूजन का विधान तथा यह इस वर्ष कब किस दिन मनाएं जाएंगे? ऐसे सभी महत्वपूर्ण संदर्भों में सारगर्भित व्याख्या प्रस्तुत है। इन पंच महापर्वों में सबसे पहले धन त्रयोदशी आती है। जो धनार्जन की शक्ति में वृद्धि प्रदान करती है।
☀️धन लाभ के रास्ते खोलती धन त्रयोदशी
मंद गति से बढ़ती हुई शीत ऋतु ज्यों-ज्यों अपने पांव धरा में पसारती हैं त्यों-त्यों जन मानस में ठंड़ी का अहसास होने लगता हैं। नाना विधि पेड़-पौधों से हरित धरा को सुखद बनाने हेतु कार्तिक मास के सुप्रसिद्ध त्यौहार दीपावली का आगमन होता है। इसके दो दिन पूर्व धनत्रयोदशी का महत्वपूर्ण त्यौहार आता है। दीपावली के त्यौहार को माँ लक्ष्मी जी के पूजन के रूप में मनाया जाता है। अतः माँ लक्ष्मी के आगमन से पूर्व तन, मन को निरोग बनाने हेतु धन त्रयोदशी का त्यौहार मनाया जाता है। यह त्यौहार अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन समुद्र मंथन के समय भगवान् धन्वंतरि देव और दैत्य समूहों के सामने प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि ने लोक कल्याण हेतु आर्युवेद के अमूल्य सिद्धांतों व दवाओं का उपयोग जनहितार्थ किया था, उन्हें देवताओं का वैद्य (डाक्टर) कहा जाता है।
☀️रूप चतुर्दशी का महत्त्व
पंचमहापर्व का दूसरा महत्वपूर्ण पर्व नरक चतुर्दशी है जो प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। पौराणिक ग्रंथों में ऐसी कथा प्रचलित है कि इस दिन रूप लावण्य को निखारने की प्रथा है। अर्थात् यूँ कह सकते है, कि सर्द हवाओं और ठण्ढ़ के चलते शारीरिक त्वचा में रूखापन आ जाता है और ऐसे व्यक्ति जिनको रक्त विकार होते है। उनकी त्वचा में खिंचाव होने के कारण हाथ व पैरों में फटना शुरू हो जाती है। अतः इस त्वाचीय वेदना से बचने हेतु पहले से ही जनमानस को प्रति वर्ष कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्दशी को सतर्क किया जाता है और तेल युक्त पदार्थों को लेप के रूप में लगाकर या तेलीय पदार्थों का प्रयोग आज से नित्य प्रति किया जाता है। जिससे चेहरे की सुन्दरता खराब न हो। जिसके कारण इसे नरक चतुर्दशी या सौंदर्य (रूप) चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है। धन त्रयोदशी के बाद यह पंचमहापर्वों का दूसरा क्रम है। आज के दिन इस तिथि में गंगा, यमुना, कावेरी, नर्वदा आदि पवित्र तीर्थों में लोग प्रातःकाल स्नान कर सम्पूर्ण त्वचा में तिलादि के तेलों को अपनी त्वचा में लगाते है। जिससे त्वचा की सुंदरता व कोमलता सदैव बनी रहें। क्योंकि आगामी समय में शीत की तीव्रता से त्वचा में शुष्कता अधिक हो जाती है। अस्तु इन त्वचा विकारों और रोगों से बचने हेतु तीर्थ व तेलों का सेवन किया जाता है।
दीपावली पूजन से मिलती है माँ लक्ष्मी की कृपा (दीपावली पूजन)
पंच महापर्वों का सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण त्यौहार दीपावली ही है। जो कार्तिक मास कृष्ण पक्ष अमावस्या को प्रेम श्रद्धा विश्वास के साथ मनाया जाता है। इसे पुरूषोत्तम मास भी कहा जाता है। भगवान विष्णु का इस मास से संबंध होने के कारण श्री हरि प्रिया महालक्ष्मी जी इसी मास में प्रकट होती है। इस मास की दिव्यता प्रकाशकता इतनी बलवती है कि निथीशकाल में प्रत्येक घर आँगन के कोने-कोने से अंधकार को नष्ट कर उसे दिव्य प्रकाशक ऊर्जावान बना देता है। अमावस के घने अंधकार से आच्छादित धरा को, छोटे-छोटे दीपमालाओं द्वारा इस प्रकार प्रकाशित किया जाता है, जिससे माँ लक्ष्मी प्रकाशित स्थान की दिव्यता को बढ़ा देती हैं तथा स्थान से संबंध रखने वाले व्यक्ति के जीवन से अंधरे को मिटाती हैं। इस महान ज्योर्तिमय पर्व की व्यापकता से भारत ही नहीं बल्कि समूचा जगत प्रभावित है। जिससे विश्व के अनेक देशों में दीपदान की प्रथा का निरन्तर विस्तार हो रहा है। चाहे अमावस्या की रात्रि का घना अंधेरा हो अथवा अल्पज्ञता व मलिन विचारों का दूषण हो, बिना दिव्य प्रकाश व अनुपम ज्ञान के उनसे छुटकारा नहीं मिल सकता है। इस महान दीपपर्व का अर्थ यही-असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।। अर्थात् यह दीप पर्व हमारे जीवन को असत्य से सत्य की ओर और अंधकार से प्रकाश की ओर सदैव बढ़ाता रहे। यह अत्यंत शुभ, मंगलकारी, कल्याणकारी तथा जीवन का संकेत प्रस्तुत करने वाला ज्योर्तिमय पर्व है।
दीपावली का महत्व एवं पूजन
इन पंच महापर्वो धनत्रयोदशी, नरक चतुदर्शी, दीपावली, गोवर्धन, भैयादूज को मनाने के सर्वसाधारण नियम हैं जिसमें घर व स्थानों की सफाई शरीर की व मन की पवित्रता, स्नान, उपहारों का दान, अन्नदान, धन व द्रव्य का दान, तीर्थ जलों में स्नान, देवालयों में व निवास स्थलों में दीपदान आदि के नियम हैं। जो इस प्रकार हैं:-
सफाईः इन पंच महापर्वों को मनाने हेतु सबसे पहला नियम हैं प्रत्येक स्थान की सफाई घर व बाहर के कोने-कोने स्वच्छ रखना। अर्थात् अपने व आस-पास के सभी संबंधित स्थानों को चाहे वह आपका निवास स्थान हो, मंदिर हो, कार्यालय हो, जलाशय हो, सामूहिक स्थान हो, रास्ते हों सभी को पूर्णतयः स्वच्छ रखना चाहिए।
♦️अन्नकूट गोवर्धन पूजन का फल
पंचपर्व का यह चतुर्थ क्रम है जिसे अन्नकूट गोवर्धन कहा जाता है। भारत देश के पूर्वकाल में शैक्षिक व आध्यात्मिक रूप से पूर्ण विकसित होने का साक्ष्य वेद ग्रंथों मे स्थान-स्थान पर मिलता रहता है। इसी का एक उदाहारण है गोवर्धन व अन्नकूट पूजा पर्व जो कि दीपावली के ठीक दूसरे दिन आता हैं। हमारे यहाँ कहीं भी स्वार्थ में अंधे होकर प्रकृति से खिलवाड़ को समर्थन नहीं दिया गया बल्कि उसका सहर्ष संरक्षण सदैव से किया जाता रहा है। जिससे यहां प्राकृतिक पूजा व उपासना को महत्त्व पूर्ण स्थान प्राप्त है। जिसे स्वतः प्रभु श्रीकृष्ण ने समर्थित किया तथा पृथ्वी पर बसने वाले मानव को यह समझाया कि पेड़, पौधें, नदियां, पर्वत तथा जल स्रोत व नाना विधि जीव जगत सब कुछ मुझसे उत्पन्न हैं। इस संदर्भ में पौराणिक कथानक हैं कि पूर्व समय में लोग इंद्र देव की पूजा 56 प्रकार के भोगों से करते थें। परन्तु द्वापर में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण लोगों को मथुरा नंदादि गांवों मे अपनी लीलाओं से तृप्त किया तब से प्रभु श्रीकृष्ण की पूजा का क्रम चल रहा है। जिससे लोग अन्नकूट गोवर्धन के दिन गोबर से बने हुए पर्वत आदि की पूजा करते हुए भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं और सामूहिक रूप से विविध व्यंजनों का भण्डारा भी करते हैं, जो समृद्धि का प्रतीक है।
♦️भैया दूज या यम द्वितीया का महत्त्व
पंच महापर्व का यह पांचवाँ एवं अति विशिष्ट पर्व है जिसे भैया दूज या द्वितीया भी कहा जाता है, जो कि कार्तिक मास की शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है। भाई बहन के पवित्र रिश्तों का प्रतीक यह त्यौहार अति विशिष्ठ है। इसका प्रमुख उद्देश्य भाई-बहनों के बीच में निर्मलता को बढ़ाना है, इसी कारण इसका नाम भैया दूज है। इस त्यौहार के माध्यम से प्रत्येक बहन अपने प्रिय भाई हेतु कामना करती है, कि उसके भाई की दीर्घायु व सेहत खिली हुई हो उनकी समृद्धि व कीर्ति सदैव बढ़ती रहे। आज के दिन बहनें अपने भाई को अपने घर बुलाती हैं तथा टीका करके नाना प्रकार स्वादिष्ट व्यंजन परोसती हैं। यदि बहन व भाई पितृ गृह में ही हो तो भी उन्हें आज के दिन अपने भाई को नाना भांति के पकवान उन्हें खिलाना चाहिए। इस व्रत के संदर्भ में पौराणिक कथानक है कि सूर्य पुत्र यम और पुत्री यमुना जो कि आपस में भाई बहन थे, बहुत दिनों के बाद एक दूसरे से आज के ही दिन मिले थे तथा उनकी बहन यमुना ने यम जी को नाना भांति के पकवानों को आदर के साथ खिलाया था। जिससे प्रसन्न भाई ने बहन को वर देने को कहा तब बहन ने ऐसा वर मांगा कि भैया यदि आप मुझ पर प्रसन्न हो तो यह वर दो कि जो भी भाई इस दिन यमुना स्नान करके अपने बहन के घर जाकर सम्मान सहित मिलें और बहन के घर में भोजन व मिष्ठान को ग्रहण करें तथा अपनी क्षमता के अनुसार बहन को द्रव्य आदि भेट दें तो उन्हें अकाल मृत्यु का भय नहीं हो न ही उन्हें यम लोक की वेदनाएं भोगनी पड़े ऐसे बहन के कल्याणकारी वचन सुन भाई ने कहा ऐसा ही होगा। तब से इस त्यौहार का बड़ा ही महत्व है।
प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य परम पूज्य गुरुदेव पंडित हृदय रंजन शर्मा अध्यक्ष श्री गुरु ज्योतिष शोध संस्थान गुरु रत्न भण्डार पुरानी कोतवाली सर्राफा बाजार अलीगढ़ यूपी व्हाट्सएप नंबर-9756402981,7500048250