आगरालीक्स… आगरा की शहर की जानी-मानी चिकित्सक डा. जयदीप मल्होत्रा के खाते में एक और उपलब्धि जुड़ गई है। उन्हें इंडियन सोसाइटी फाॅर असिस्टेड रिप्रोडक्शन (इसार) का प्रेसीडेंट इलेक्ट चुना गया है। वह आगामी वर्ष 2020 में वह देश में स्त्री रोग विशेषज्ञों के इस बडे संगठन की कमान संभालेंगी।
इंडियन सोसाइटी फाॅर असिस्टेड रिप्रोडक्शन का यह 22वां वार्षिक सम्मेलन कोलकाता के साइंस सिटी में 19 से 22 अप्रैल तक आयोजित किया गया था। इसमें देश के विभिन्न राज्यों-शहरों से आए विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया, साथ ही अपने ज्ञान को साझा किया। इस बीच शहर की जानी-मानी चिकित्सक एवं आईवीएफ विशेषज्ञ डा. जयदीप मल्होत्रा को इसार का प्रेसीडेंट इलेक्ट चुना गया। वह अगले वर्ष इस संगठन की अध्यक्ष होंगी। बता दें कि वर्तमान में डा. जयदीप मल्होत्रा फेडरेशन आॅफ आॅब्सटेट्रिकल एंड गायनोलाॅजिकल सोसाइटी आॅफ इंडिया (फाॅग्सी) की अध्यक्ष भी हैं। अध्यक्ष पद पर काबिज रहते हुए उन्होंने इस साल ‘पंख और परवाज दो, नारी को आकाश दो…’ की थीम पर देश भर में महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा और सशक्तिकरण के मुददे पर जोर दिया है। साथ ही उन्होंने गर्भकाल में ही संतान में स्वास्थ्य और संस्कारों का सृजन करने के लिए ‘अदभुत मातृत्व’, महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर के खतरे से बचाने के लिए ‘अक्षया जीवन’, देश भर में पैरामेडिकल स्टाॅफ को और अधिक निपुण बनाने के लिए ‘समर्थ’ और मेडिकल दस्तावेजों को सुरक्षित बनाने के लिए ‘हैल्थ-ई-इंडिया’, ‘डाॅकआॅन’ जैसी तमाम योजनाएं लांच की हैं। सम्मेलन के अंतर्गत स्व. डॉ प्रभा मल्होत्रा स्मृति अवॉर्ड डॉ कामिनी राव को प्रदान किया गया।
सम्मेलन में बांझपन पर दी महत्वपूर्ण जानकारी….
इस दौरान तकनीकी सत्र को संबोधित करते हुए डा. जयदीप ने सामान्य और आईवीएफ से होने वाले गर्भाधान के बारे में जानकारी दी। आईवीएफ प्रक्रिया के दौरान उन्हें और मदद की जरूरत पडती है। इसमें अधिक सचेत भी रहना पड़ता है और इलाज के दिशा-निर्देशों का पालन जरूरी होता है। आईवीएफ क्यों फेल होता है और हम क्या कर सकते हैं ? पर आयोजित एक खास सत्र की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि जब भी कोई दंपति आईवीएफ का चुनाव करता है तो उसे मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से तैयार रहना चाहिए। अगर हम एक पौधा भी लगाते हैं तो हमें पता है कि पहले जमीन तैयार की जाती है। अगर जमीन अच्छी नहीं होगी तो बीज कितना भी अच्छा हो वह फल-फूल नहीं पाएगा। इसी तरह टेस्ट ट्यूब बेबी भी एक एंब्रियो को बाहर बनाने की प्रक्रिया है। डा. केशव मल्होत्रा ने अपना शोध प्रस्तुत करते हुए कहा कि पुरूषों में शुक्राणुओं की संख्या लगातार कम होती जा रही है। जिसका कारण बदलती जीवनशैली, प्रदूषण एवं कीटनाशकों का बढता इस्तेमाल माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि इंट्रा साइटोप्लाॅज्मिक स्पर्म इंजेक्शन (इक्सी) जैसी आधुनिक तकनीक की मदद से वे पुरूष भी पिता बन सकते हैं जिनके स्पर्म में शुक्राणुओं की संख्या कम या शून्य हो। वहीं एंब्रियोस्कोप से लैब में विकसित हो रहे भ्रूण पर नजर रखी जा सकती है। इससे आईवीएफ फेल होने की संभावनाएं भी कम हुई हैं।
बांझपन की जांच और इलाज में अल्ट्रासाउंड कारगर….
सम्मेलन के अंतर्गत बांझपन में अल्ट्रासाउंड की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए शहर के वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. नरेंद्र मल्होत्रा ने बताया कि अल्ट्रासाउंड से महिला व पुरूष दोनों के बांझपन का पता लगाया जा सकता है। यह तकनीक बांझपन के इलाज में भी बेहद कारगर साबित हो रही है। अल्ट्रासाउंड गाइडेड ट्रीटमेंट से बांझपन दूर करने में काफी मदद मिलती है। रेनबो हाॅस्पिटल के रेडियोलाॅजिस्ट डा. ऋषभ बोरा ने एक्टोपिक प्रेग्नेंसी पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा गर्भ जो अपने स्थान से हटकर अन्य कहीं स्थापित हो जाता है, उसे एक्टाॅपिक प्रेग्नेंसी कहते हैं। वैसे गर्भ की निश्चित जगह तो गर्भाशय है, लेकिन कई बार यह गर्भ गर्भाशय के बाहर ही ठहर जाता है। आम तौर पर देखा गया है कि एक्टाॅपिक प्रेग्नेंसी सबसे अधिक फैलोपिन ट्यूब के अंदर होती है।