आगरालीक्स…एशिया कप से भारत के बाहर होने की पटकथा तो जिम्बाब्वे दौरे पर लिख गई थी। आईपीएल के सूरमा बड़े टूर्नामेंट में टीम की लुटिया डुबोने में पीछे नहीं।
हार से हाहाकार पर मुद्दे से नहीं कोई सरोकार

एशिया कप में भारत की श्रीलंका से हार के बाद हाहाकार मचा हुआ है। हार को लेकर तरह-तरह के बहाने बनाए जा रहे हैं, सभी अपने-अपने प्रकार से इसकी समीक्षा कर रहे हैं कि ऐसा होता तो भारत जीत जाता, ऐसा नहीं करते तो भारत जीत जाता। असल मुद्दे पर लौटने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
दस माह में सात कप्तान बदले, कोच भी दो-दो
विश्वकप में भारत की हार के बाद टीम इंडिया को नये सिरे से सजाने-संवारने के लिए कोच से लेकर कप्तान तक बदल दिए गए। हालात यह हो गए कि 10 माह में सात क्रिकेटरों को कप्तानी संभाली। कोच भी राहुल और लक्ष्मन रहे।
अंतरराष्ट्रीय मैचों में ताश के पत्तों की तरह ढहते
भारत के कई खिलाड़ियों को भारत के लिए खेलने का मौका मिला। क्रिकेट के दिग्गज कहने लगे हमारे पास बहुत मजबूत बेंच स्ट्रैंथ है। लेकिन आईपीएल के आधार पर बनाई बेंच स्ट्रैंथ अंतरराष्ट्रीय स्तर के मैचों में दबाव में ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है।
आईपीएल में चमके तो खुल गई लॉटरी
आईपीएल के किसी सीजन में कोई खिलाड़ी चमक जाता है तो उसे तुरंत टीम इंडिया की टिकट थमा दी जाती है। आईपीएल में चमकने वाले वरुण चक्रवर्ती को विश्वकप में मौका मिला लेकिन वहां ऐसी बखिया खड़ी हुई कि मिस्ट्री गेंदबाज के नाम से मशहूर इस खिलाड़ी का कोई पता नहीं है।
आईपीएल के सूरमा, बड़े मैचों में फुस्स
दिग्गज खिलाड़ी केएल राहुल हर आईपीएल में रनों का अंबार लगाते हैं लेकिन बड़े मैचों में एक-बार चलने के बाद फुस्स हो जाते हैं। हार्दिक पांडेय अपनी टीम को आईपीएल जिता ले जाते हैं लेकिन टीम इंडिया में एक-दो मौकों को छोड़ दिया जाए तो साधारण आलराउंडर साबित होते हैं।
जिम्बाब्वे दौरे पर ही राहुल थे फ्लॉप तो फिर क्यों बनाया उपकप्तान
भारत के एशिया कप में हार की पटकथा तो जिम्बाब्वे दौरे के समय ही लिख ली गई थी, जबकि आईपीएल में चोट के बाद वापसी कर रहे केएल राहुल को फिट होते ही शिखर धवन से कप्तानी छीनकर राहुल को सौंप दी। राहुल ने कमजोर जिम्बाब्वे जैसी टीम के सामने औसत प्रदर्शन नहीं किया लेकिन फिर भी उन्हें टीम इंडिया का उप कप्तान भी बना दिया।
खिलाड़ियों के प्रदर्शन में निरंतरता नहीं रही
टीम इंडिया के प्रमुख बल्लेबाज फार्म में हैं ही नहीं। हालत यह है कभी रोहित चमके तो कभी विराट, सूर्या का बल्ला चला तो हार्दिक भी अपने हाथ खोल देते हैं। लेकिन किसी भी खिलाड़ी मे निरंतरता के प्रदर्शन की कमी बनी रहती है। धोनी के समय खिलाड़ियों के अपने स्थान पर जमकर प्रदर्शन करने और निरंतरता बनाए रखने की प्रतिबद्धता थी लेकिन अब ऐसा नहीं है।
बल्ले के साथ गेंद से सहयोग देने वाले खिलाड़ी कम
टीम इंडिया अब ऐसे खिलाड़ी भी नहीं हैं जो बल्ले के साथ गेंद से अपना योगदान दें। धोनी के समय में सचिन, सहवाग से लेकर, रैना, युवराज सब गेंदबाजी करते थे और सफल रहते थे। मौका मिलने पर एक-दो बार धोनी भी ग्लब्स उतारकर गेंदबाजी में हाथ अजमा चुके थे।