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Agra News: Newborn screening will detect congenital malformations and disorders of the newborn child…#agranews

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आगरालीक्स…नवजात बच्चे की जन्मजात विकृतियों और डिसआर्डर का पता लगाएगी न्यूबोर्न स्क्रीनिंग. जन्म के 48 घंटे में इस स्क्रीनिंग टेस्ट से हारेंगी 7000 दुर्लभ बीमारियां. आगरा में ‘हैल्दी चिल्ड्रन हैल्दी नेशन’ पर हुई कार्यशाला.

शिशु की पहली किलकारी और घर में नए मेहमान का आगमन सिर्फ माता—पिता ही नहीं बल्कि पूरे परिवार के लिए दुनिया की सबसे बड़ी खुशी है, लेकिन बेहद कम मामले ऐसे भी हैं जिनमें माता—पिता इसे अभिशाप समझ बैठते हैं। ऐसा तब होता है जब बच्चे में जन्मजात विकृतियां होती हैं। इसके लिए जरूरी है कि बच्चे के पैदा होने के बाद जब उसके कुछ हेल्थ टेस्ट किए जाते हैं तभी एक और टेस्ट भी एड कर दिया जाए जो है न्यूबोर्न स्क्रीनिंग। इस टेस्ट के जरिए बच्चे के अंदर किसी भी पैदाइशी डिस्ऑर्डर का पता लगाया जा सकता है। न्यूबोर्न स्क्रीनिंग क्या होती है और क्यों यह नवजात शिशु और पैरेंट्स के लिए भी जरूरी है इस बारे में आगरा में एक बड़ी चर्चा हुई।

आईईएम सपोर्ट चैरिटेबिल ट्रस्ट और मेटाबॉलिक एरर एंड रेयर डिजीज ऑर्गनाइजेशन (मर्ड इंडिया) ने आगरा में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और आगरा आब्स एंड गायनी सोसायटी के साथ मिलकर हैल्दी चिल्ड्रन हैल्दी नेशन कार्यशाला आयोजित की। यह कार्यशाला उजाला सिग्नस रेनबो हॉस्पिटल के सभागार में हुई और रेनबो आईवीएफ कीं निदेशक डॉ. जयदीप मल्होत्रा, आईएमए—एमएस के चेयरमैन डॉ. डीवी शर्मा, सचिव डॉ. अनुभव गोयल, उजाला सिग्नस रेनबो हॉस्पिटल के निदेशक डॉ. नरेंद्र मल्होत्रा, एओजीएस कीं अध्यक्ष डॉ. सविता त्यागी के साथ ही दिल्ली और जयपुर से आए एक्सपर्ट ने महत्वपूर्ण जानकारियां दीं ।

दिल्ली से आईं आईईएम की ट्रस्टी दिल्ली से आईं सारिका मोदी ने बताया कि देश में दुर्लभ बीमारियों पर बहुत काम हो रहा है। सरकारों के साथ मिलकर तमाम संस्थाएं बच्चों और अभिभावकों के हित में काम कर रही हैं। फिलहाल एक बड़ी जरूरत देश में न्यूबोर्न स्क्रीनिंग के लिए जागरूकता की कमी के रूप में देखी जा रही है। इसे बढ़ावा देने के लिए ही देश के स्त्री रोग और बाल रोग विशेषज्ञों से अपेक्षित सहयोग मांगा जा रहा है, क्योंकि उनके बिना दुर्लभ बीमारियों को हराना एक असंभव कार्य है।

जयपुर से आए मर्ड इंडिया फाउंडेशन के विकास भाटिया ने बताया कि मेटाबॉलिज्म उन केमिकल रिएक्शंस को कहा जाता है, जो हमारे शरीर में एनर्जी को कंवर्ट करने या इस्तेमाल करने के लिए होते हैं। वहीं, इनबॉर्न मेटाबॉलिज्म डिसऑर्डर वो जेनेटिक कंडिशस होती हैं, जिसके कारण मेटाबॉलिज्म प्रॉब्लम्स हो सकती हैं। इससे पीड़ित लोगों में मेटाबॉलिज्म प्रॉब्लम जन्मजात देखी जाती है। इन डिसऑर्डर्स के रोगियों में एंजाइम डेफिशियेंसी के कारण डिफेक्टिव जीन्स पाए जाते हैं। ऐसे कई विभिन्न जेनेटिक मेटाबोलिक डिसऑर्डर हैं, जिनके लक्षण और उपचार आदि अलग-अलग हो सकते हैं। इनबॉर्न मेटाबॉलिज्म डिसऑर्डर्स में शिशु का भोजन एनर्जी में नहीं बदलता है। एमीनोएसिड, स्टेरॉयड नहीं बनते हैं। प्रोटीन की मात्रा काफी बढ़ी हुई होती है, जिसे यदि मैनेज नहीं किया जाए तो मेंटल रेटरडेशन हो जाता है। इससे बच्चों की मृत्यु तक हो जाती है। बच्चे का मानसिक और शारीरिक विकास रूक जाता है। पहले तो इसके बारे में पता भी नहीं चलता था। शरीर में प्रोटीन का स्तर काफी बढ़ जाता था।

डॉक्टर भी इसे डायरिया समझ इसका इलाज करते रहते थे। मगर अब इसका पता लग जाता है। सही समय पर डायग्नोज होने से उपचार भी संभव हुआ है। इस तरह के बच्चों को विशेष प्रकार से तैयार लो प्रोटीन डाइट दी जाती है। पहले भारत में खाना भी उपलब्ध नहीं था। विदेश से आता था। लेकिन अब भारत में दो कंपनियां इन बच्चो का भोजन तैयार कर रही हैं। पैरेंट्स को काउंसलिंग के दौरान सारी जानकारी दी जाती है, क्योंकि जब उनको बच्चे की इस परिस्थिति का पता चलता है तो वे परेशान हो जाते हैं। ऐसे में ओआरडीआई आॅर्गनाइजेशन के अंतर्गत 250 से अधिक संस्थाएं काम कर रही हैं। सरकारें काफी काम कर रही हैं। पैरेंट्स समूहों की काफी मदद ली जा रही है। इस दौरान डॉ. अंकुर बंसल, डॉ. नीहारिका मल्होत्रा, डॉ. किया जैन, डॉ. प्रिया सरीन, रीजनल बिजनेस हैड, वेस्टर्न यूपी, दिव्य प्रशांत बजाज आदि मौजूद थे।

स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों की भूमिका अहम
रेनबो आईवीएफ कीं निदेशक डॉ. जयदीप मल्होत्रा ने स्वस्थ गर्भावस्था— स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों की भूमिका विषय पर संबोधित किया। गायनेकोलॉजिस्ट्स का काम आसान नहीं होता। वे नौ महीनों तक बल्कि उससे पहले से महिला को निगरानी में रखते हैं, जरूरी सलाह देते हैं। यही कीमती समय होता है। इस बीच जेनेटिकल जांचें जरूरी होती हैं। वहीं बच्चे के जन्म के बाद स्त्री रोग और बाल रोग दोनों विशेषज्ञों का काम शुरू होता है। जहां नवजात की इतनी जांचें कराई जाती हैं वहां एक और सही, लेकिन यह अहम जांच है। यह नवजात का जीवन और भविष्य दोनों निर्धारित करती है।

24 से 48 घंटे के भीतर हो जानी चाहिए न्यूबोर्न स्क्रीनिंग
डॉ. स्वाति द्विवेदी ने बताया कि न्यूबोर्न स्क्रीनिंग टेस्ट नवजात शिशुओं में डेवलपमेंटल, मेटाबॉलिक और जेनेटिक डिसऑर्डर का पता लगाने में मदद करते हैं। अर्ली डिटेक्शन और डायग्नोस समय पर इलाज में मददगार साबित होते हैं और संभावित जोखिमों को रोकने या कम करने में मदद करते हैं। जन्म के 24-48 घंटे में न्यू बोर्न बेबी की जांच की सिफारिश की जाती है। वेस्टर्न कंट्रीज में नवजात की जांच जरूरी है। हालांकि, भारतीय आबादी में जागरूकता पैदा करने की सख्त जरूरत है।

इससे क्या होगा ?
उजाला सिग्नस रेनबो हॉस्पिटल के निदेशक डॉ. नरेंद्र मल्होत्रा ने बताया कि न्यू बोर्न स्क्रीनिंग का उद्देश्य नवजात शिशुओं में संभावित घातक स्थितियों का जल्द से जल्द पता लगाना है। यह तुरंत इलाज शुरू करने में मदद करता है। इन स्थितियों में से कई अगर बिना इलाज किए छोड़ दी जाती हैं, तो गंभीर लक्षण और प्रभाव दिख सकते हैं, जैसे कि आजीवन नर्वस सिस्टम डैमेज होना, बौद्धिक और शारीरिक अक्षमताएं और मृत्यु भी।

हैल्दी चिल्ड्रन—हैल्दी नेशन पैनल डिस्कशन
कार्यशाला के अंतर्गत हैल्दी चिल्डन—हैल्दी नेशन विषय पर एक पैनल डिस्कशन भी हुआ जिसमें डॉ. संगीता चतुर्वेदी, डॉ. आकांक्षा अरोड़ा, डॉ. संजीव अग्रवाल, डॉ. विनय मित्तल, डॉ. इला किशोर, डॉ. गार्गी गुप्ता, डॉ. निधि बंसल, डॉ. मनप्रीत शर्मा शामिल रहे।

Written by
Agraleaks Team

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