आगरालीक्स…दुखद, आगरा के दिव्यांग युवक ने सल्फास की गोलियां खाकर ट्रेन के आगे कूदकर दी जान. कर्मचारी चयन आयोग में था बाबू…सुसाइड नोट में लिखी दर्दनाक पीड़ा—कहानी खत्म, टाटा, बाय—बाय
आगरा के अछनेरा के गांव पोखर के रहने वाले एक दिव्यांग सरकारी कर्मचारी ने फरह स्थित दीनदयाल धाम रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के आगे कूदकर अपनी जान दे दी. मृतक का नाम प्रमोद बताया गया है जो कि एक पैर से विकलांग था और कर्मचारी चयन आयोग में बाबू के पद पर था. पुलिस को घटनास्थल से सुसाइड नोट मिला है जिसमें उसने दिव्यांग होने के कारण शर्मिंगदगी ओर निराशा व्यक्त की है और लिखा है कि वह अपने जीवन से परेशान हो चुका है. पुलिस को स्टेशन के प्लेटफार्म से उसकी स्कूटी भी खड़ी मिली है.कर्मचारी चयन आयोग के कार्यालय में था बाबू
मृतक प्रमोद मथुरा के हाइवे प्लाजा में कर्मचारी चयन आयोग के कार्यालय में बाबू के पद पर तैनात था और हर दिन स्कूटी से आना—जाना करते थे. सोमवार सुबह भी वह ड्यूटी के लिए निकले थे लेकिन मथुरा न जाकर फरह के दीनदयाल धाम रेलवे स्टेशन पर आगरा से मथुरा की ओर जाने वाले नवनिर्मित प्लेटफार्म पर खड़े हो गए. यहां पर उन्होंने पहले सल्फास की गोलियां खाईं और इसके बाद ट्रेन के आगे छलांग लगा दी जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई. पुलिस को स्कूटी के पास ही कीटनाशक दवा की खाली डिब्बी भी मिली है.
2024 में हुआ था चयन
प्रमादे के घुटने में ट्यूमर था जिसके कारण वर्ष 2020 में एक पैर काटा गया. इसके बाद वह वैसाखियों के सहारे चलने लगे. वर्ष 2024 में विकलांग कोटे से उनका कर्मचारी चयन आयेाग में बाबू के पद पर चयन हो गया था. पुलिस को तीन पेज का जो सुसाइड नोट मिमला है उसमें आत्महत्या का कारण दिव्यांग होना लिखा है.
'मैं अपने जीवन से बहुत परेशान हो चुका हूं. ना कहीं जा पा रहा हूं और न कुछ कर पा रहा हूं. घर पर बैठे—बैठे मन नहीं लगता. न ही टाइम कट पाता है. फोन चला कर परेशान हो चुका हूं. हर चीज में यह पैर समस्या बन जाता है. मैं बहुत दुखी हूं. पहले सोचा था जीवन कट जाएगा, पर यह नहीं हो पा रहा है. मैं रोज मरकर जी रहा हूं. मेरा जीवन बिल्कुल रुक सा गया है. बिना पैर के ऐसे चलने में बहुत शर्म लगती है. ऐसा लगता है, ऐसे जीवन से तो मरना ही ठीक है. घरवालों के लिए जीने की कोशिश की पर हो नहीं पा रहा है. आफिस में भी बैठे—बैठे मन नहीं लगता और सब लोग इधर से उधर घूमते हैं. सब काम करते हैं. मे। अपने को ऐसी हालत में एक्सेप्ट नहीं कर पा रहा. मैं हमेशा के लिए सोना चाहता हूं. मरने का तो चार से पांच महीने से सोचता हूं. मैं टूट चुका हूं. मुझे किसी चीज की खुशी नहीं होती. बैसाखियों से चलने में मुझे बहुत शर्म आती है. बहुत लो फील होता है. मेरी अच्छाई को कोई नहीं देखा. सबइसी कमी को देखते हैं. मै। अपना आत्मविश्वास खो चुका हूं. इसलिए जाने दे रहा हूं. कई बार सुसाइड नोट लिख लिया ओर लग रहा है कि अबकी बार हिम्मत कर पाउंगा. मेरा जीवन निरर्थक हो गया है. इसका कोई मतलब नहीं है. पिछले चार साल इतने खराब निकले हैं. मैं हार चुका हूं. मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूं. बैसाखियों के सहारे जीवन नहीं कटता. बहुत शर्म महसूस होती है. मेरी हर चीज बदल गई. इस पैर ने सबकुछ छीन लिया. अब जिंदगी पहले जैसे कभी नहीं हो पाएगी. एक दिन मरने के लिए रोज मरना पड़ेग. नौकरी का भी कुछ पता नहीं, कौन सा शहर मिलेगा. कैसे ट्रेनिंग करूंगा. सही चीज बहुत मुश्किल लगती है. इससे हर चीज प्रभावित हो गई है. सॉरी टू आल.. यहीं तक था. कहानी हुई खत्म. टाटा बॉय—बॉय.