आगरालीक्स…आगरा में सैकड़ों परिवार अपनी छत पर नहीं जाते हैं. महीनेां हो जाते हैं, लेकिन छत पर नहीं जाते. इसके पीछे का कारण हैरान कर देगा…देखें वीडियो
आगरा के सैकड़ों परिवार ऐसे हैं जो कि अपने घर की छतों पर ही नहीं जाते हैं. दिन, महीने साल हो जाते हैं लेकिन छत पर जाने का मन होने के बावजूद ये लोग अपना मन मसोस कर रह जाते हैं. महिलाएं और बच्चों को तो अकेले छत पर जाने की इजाजत ही नहीं है, क्योंकि छत पर एक ऐसा डर है जिसके कारण ये लोग हमेशा भयभीत रहते हैं. ये डर है बंदरों का. आगरा में करीब आधा शहर बंदरों के आतंक से परेशान है. पुराने शहर में तो बंदरों की तादाद इतनी ज्यादा है कि कई बार ये लोगों पर हमला बोल चुके हैं. नगर निगम और या फिर प्रशासन…यहां के लोग हर बार बंदरों को लेकर अपनी परेशानी शिकायत के रूप में बताते हैं, लेकिन हल अभी तक नहीं हो पाया है. बंदरों को पकड़ने के लिए आश्वासन और वादे होते हैं, योजनाएं भी बनता है, कभी—कभी अभियान भी चलाया जाता है लेकिन बंदरों के आतंक से इन हजारों लोगों को मुक्ति नहीं मिल रही है.
नूरी दरवाजा के रहने वाले तुषार गोयल का कहना है कि एरिया में बंदरों की संख्या इतनी ज्यादा है कि वो छतों से लेकर गलियों तक में बैठे रहते हैं. ऐसे में स्कूल और ट्यूशन जाने वाले बच्चों को इनका डर हमेशा लगा रहता है. जरा सा इन्हें हटाने पर ये आक्रामक हो जाते हैं और हमला कर देते हैं. क्षेत्र में लगभग सभी घरों में खिड़कियां जालियों से पैक हैं. छतों के दरवाजे हमेशा बंद रहते हैं. अपनी छत होने के बावजूद बच्चे छत पर खेलने के लिए नहीं जा सकते हैं. हाल ही में हमने पतंग उड़ाने की सोची लेकिन जैसे ही छत पर गए तो वहां काफी संख्या में बंदर बैठे हुए थे, ऐसे में अपने मन को मारकर वापस कमरों में लौट आए. तुषार गोयल का कहना है कि पिछले कुछ महीने पहले उनकी पत्नी को बंदरों ने काट खाया था जिसके बाद उनमें बंदरों का डर इतना व्याप्त हो गया है कि अब वो छत पर अकेले कभी भी नहीं जातीं. बच्चों के लिए तो अकेले छत क्या गलियों से होकर भी जाना मनाही है.
ये हाल सिर्फ नूरी दरवाजा क्षेत्र का नहीं है, इसके आसपास के जितने इलाके हैं, सभी जगह बंदरों का आतंक है. सुबह से शाम तक बंदर घर की छतों पर बैठे रहते हैं. शीतला गली, गुड की मंडी, फुलट्टी, माईथान, रावतपाड़ा, दरेसी, मोती कटरा सहित कई बड़े एरिया में हमेशा बंदर रहते हैं. वहीं पास में ही एसएन हॉस्पिटल हैं जहां भी हमेशा बंदर रहते हैं. ये बंदर कभी किसी तीमारदार के हाथ से खाने का सामान छीन ले जाते हैं तो कभी दवाइयां. हॉस्पिटल से बंदरों को पकड़ने के लिए कभी लंगूर लाया गया तो कभी निगम की टीम द्वारा बंदर पकड़ने का अभियान चलाया गया लेकिन ये समस्या आज भी जस की तस है. वहीं इसके अलावा ताजगंज एरिया में भी बंदरों की संख्या बहुत ज्यादा है. हाल ही में ताजमहल पर बंदरों के हमले से कई पर्यटकों के घायल होने की खबरें भी सामने आई थीं.
नगर निगम के आंकड़ों के अनुसार आगरा के 100 वार्डों में करीब 10 हजार बंदर हैं, लेकिन नगर निगम के ये आंकड़े करीब छह साल पुराने हैं. लोगों का मानना है कि शहर में बंदरों की संख्या 25 हजार से अधिक है. कलक्ट्रेट, जिला अस्पताल, राजा की मंडी रेलवे स्टेशन से लेकर ताजमहल तक बंदरों से अछूते नहीं हैं. शनिवार को नगर निगम ने बंदरों को पकड़ने का अभियान ताजमहल के पास चलाया. पश्चिमी गेट से लेकर शिल्पग्राम तक पिंजरे लगाए गए. करीब 144 बंदर पकड़े भी गए. इन बंदरों को पकड़कर किसी वन क्षेत्र में छोड़ा जाएगा. बंदरों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए नसबंदी ही विकल्प है लेकिन नगर निगम की ओर से अभी तक इस को लेकर कोई ठोस प्लान नहीं तैयार किया गया है.\