आगरालीक्स.. आगरा में डॉक्टरों ने बताया कि पति पत्नी को संभोग में दर्द या तकलीफ है, इसे छिपाएं नहीं। किसी भी परिवार की धुरी महिला होती है। महिला के स्वास्थ्य का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपूर्ण परिवार पर पड़ता है। एक स्वस्थ महिला ही अपने परिवार की देखभाल व पोषण संबंधी विविध आवश्यकताओं को सुचारू रूप से परिपूर्ण करती हुई परिवार के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि अधिकांश महिलाएं अपनी बीमारियों पर जिंदगी भर पर्दा डाले रहती हैं, जो उन्हें मौत के मुंहाने तक ले पहुंचता है। यह जानकारी आगरा में आयोजित एक चिकित्सकीय कार्यशाला में विशेषज्ञों ने दी।
यूरोपियन सोसायटी आॅफ एस्थेटिक गायनेकोलाॅजी की दो दिवसीय एस्थेटिक गायनेकोलाॅजी कार्यशाला आयोजित की गई है। फाॅग्सी और आईसीओजी के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला का उद्घाटन मंगलवार सुबह फाॅग्सी की अध्यक्ष डा. जयदीप मल्होत्रा, यूरोपियन सोसायटी आॅफ एस्थेटिक गायनेकोलाॅजी के संस्थापक और अध्यक्ष डा. अलेक्जेंडर बदर, एल्मा लेजर के प्रबंध निदेशक सोमन दत्ता ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलन कर किया। डा. जयदीप ने कहा कि

इस कार्यशाला का मकसद भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है। महिलाओं की तमाम ऐसी बीमारियां या समस्याएं हैं जिनके बारे में वह शर्म और झिझक के कारण परिवार में किसी को या डाॅक्टर को नहीं बतातीं और लंबे समय तक बीमारियों के साथ जीवन जीती रहती हैं। ऐसे में होता यह है कि कई बार बीमारी नियंत्रण से बाहर हो जाती है और बात जीवन-मरण पर पहुंच जाती है। डा. अलक्जेंडर ने देश भर से आए डाॅक्टरों को प्रशिक्षित किया। उन्होंने कहा कि भारत में अधिकांश महिलाएं मूत्र असंयमितता से जूझती रहती हैं और इनमें से लगभग 74 प्रतिशत तनाव का शिकार भी होती हैं। एसयूआई का प्रमुख कारण 40 साल से अधिक आयु, वजाइनल डिलीवरी, पोस्ट मीनोपाॅज की स्थिति, बीएमआई 25 से अधिक होना, डायबिटीज, अस्थमा व व्यसन हैं। उन्होंने कहा कि मूत्र का बार-बार रिसना, योनि का सूखापन, खुजली का बार-बार होना, गर्भाशय का बाहर खिसकना, संभोग में दर्द या तकलीफ आदि इसके लक्षणों में आते हैं, लेकिन लोगों को इस सबके इलाज की जानकारी ही नहीं। महिलाएं इन्हें छिपाती रहती हैं, जबकि आज तकनीक ने इन समस्याओं के इलाज को आसान बना दिया है, जिसमें सर्जिकल और नाॅन सर्जिकल दोनों तरह की प्रक्रियाएं आती हैं।

डा. नरेंद्र ने कहा कि जिस तरह भारत में बढती जनसंख्या, गरीबी, बाल विवाह, दहेज प्रथा बड़ी समस्याएं हैं उसी तरह बीमारियों से पर्दाप्रथा भी खूब देखने को मिलती है। इससे होता यह है कि एक परिवार का संचालन करने वाली महिला का जीवन ही खतरे में पड जाता है। न सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में बल्कि शहरों में भी देखा गया है कि महिलाएं भय, संकोच व निरक्षरता के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को परिवार या चिकित्सकों के सामने रखने में हिचकिचाती हैं। आज भी समाज में प्रचलित अंधविश्वास व पर्दाप्रथा के कारण महिलाएं स्वतंत्र निर्णय लेकर अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का समय पर इलाज नहीं करवा पाती हैं। जिसके परिणाम अंततः पूरे परिवार को भुगतने पडते हैं। यौन रोगों के बारे में तो वह बात तक नहीं करतीं। जब तकलीफ हद से ज्यादा बढ जाती है तो पता चलता है, लेकिन या तो दूर हो चुकी होती है या इलाज सही नहीं मिल पाता।
फैमिलिफट लेजर सिस्टम बना वरदान…..
इन समस्याओं के इलाज पर चर्चा करते हुए एल्मा लेजर के सोमन दत्ता ने कहा कि तकनीक काफी आगे बढ चुकी है। फैमिलिफ्ट लेजर सिस्टम एक ऐसी तकनीक है, जिससे तीन या चार सिटिंग में इनमें से कई रोगों को खत्म किया जा सकता है। कोई सर्जरी नहीं, कोई डाउनटाइम नहीं, कोई दवा नहीं, कोई दर्द नहीं। उत्तर भारत में अभी आगरा के रेनबो हाॅस्पिटल में फिलहाल यह तकनीक उपलब्ध है। यह कोई सर्जिकल प्रोसेज नहीं है और कई मामलों में 95 प्रतिशत तक सफलता दर्ज की गई है। यूं कहें कि महिलाओं की गुप्त समस्याओं का निवारण अब लेजर उपचार द्वारा संभव है।
इन रोगों का इलाज संभव
– मूत्र का बार-बार रिसना
– योनि का सूखापन
– बार-बार खुजली होना
– योनि द्वार का ढीलापन
– गर्भाशय का बाहर खिसकना, प्रारंभिक अवस्था में
– संभोग में दर्द या तकलीफ