आगरालीक्स…डॉ. भीमराव आंबेडकर विवि मं चल रहे सात दिवसीय विज्ञान प्रसार महोत्सव का हुआ समापन..विजेताओं को किया गया पुरस्कृत..
आगरा की डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में सात दिवसीय विज्ञान प्रसार महोत्सव का समापन आज “विज्ञान के प्रसार का महोत्सव” के अंतर्गत धूमधाम से हुआ. समापन सत्र के दौरान सभी गतिविधियों के विजेताओ को पुरस्कृत किया गया और सर्टिफिकेट से हौसला बढाया गया. महोत्सव में पहले 6 दिन हुई कई अलग और रोचक गतिविधियों के ये सभी विजेताओं को आज सुबह यूनिवर्सिटी कम्युनिटी रेडियो में साक्षात्कार देने का मौका मिला. रेडियो पर ये इंटरव्यू प्रोग्रामिंग हेड पूजा सक्सेना ने लिया. इसमें तकनिकी सहियोग रेडियो के इंजिनियर तरुण श्रीवास्तव ने किया. आज के इस समापन सत्र के अध्यक्ष रहे विश्विधालय के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक रहे और मुख अतिथि के रूप में दयालबाग एजुकेशनल इंस्टिट्यूट (डीम्ड यूनिवर्सिटी) के कुलपति प्रो. पीके कालरा रहे. विशिष्ट अतिथि रहे प्रो. अजय तनेजा (उप-कुलपति), प्रो. संजीव कुमार, प्रो. वी के सारस्वत मंच पर उपस्थित रहे.

मुख्य अतिथि प्रो. पीके कालरा का कहना था कि विज्ञान को समझने के लिए अब दायरा बढ़ाने की जरूरत है। परंपरागत विज्ञान के साथ अब उसके दायरे से परे के विषयों पर ध्यान केंद्रित कर अवचेतन मन की स्थित को भी विज्ञान से जोड़ने की जरूरत है। इसके लिए माइक्रो कॉशन और मेक्रो कॉशन के बीच सामंजस्य बनाना जरूरी है। बिना इसके सीमित दायरे में बंधकर कभी विज्ञान की सीमाओं को विस्तार नहीं दिया जा सकता है। प्राचीन काल में हमारा विज्ञान शास्त्र इसलिए ही सर्वोच्च स्तर पर था क्योंकि उस समय ध्यान और आध्यात्मिक शक्तियों को विज्ञान से जोड़कर ही खोज की जाती थीं। आज तरक्की पाने के लिए उसी दिशा में सोचने की आवश्यकता है। जीवन की भौतिक आवश्यकताओं को सीमित कर ज्ञान की आवश्यकता बढ़ाने से ही क्वालिटी ऑफ लाइफ प्राप्त की जा सकती है।
विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक का कहना था कि विश्व की उत्पत्ति कैसे हुई और यह कैसे काम करता है, इसको लेकर तमाम शोध चल रहे हैं, लेकिन इस रहस्य और इस थ्योरी की खोज भारत में ध्यान के माध्यम से सदियों पहले हो चुकी है। यही स्थिति गॉड पार्टिकल थ्योरी को लेकर हैं, उस शोध पर भी भारतीय वैज्ञानिक एसएन बोस का हस्ताक्षर हुए थे। क्वांटम थ्योरी में भी रुद्र तांडव की प्रतिमा विद्यमान होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि विश्व की उत्पति का राज कहां छिपा है, भारत पहले ही तलाश चुका था, भारतीय मनीषा ने सुपर विज्ञान को खोजा था। आज भी वैज्ञानिक कॉन्शियस पर काम कर रहे हैं। इसलिए वर्तमान जरूरतों को देखते हुए कॉन्शियस को विज्ञान से मिलाना होगा। यह थ्योरी भी हमने ही दी कि पूर्णता में पूर्ण को मिलाकर या घटाकर भी पूर्णता ही प्राप्त की जाती है। इसलिए प्राचीन विज्ञान और ज्ञान को मिलाकर हमें नई सोच के साथ आगे बढ़ना होगा। तभी हम नए विज्ञान की चौथी उद्योग क्रांति में खुद को साबित कर पाएंगे, जो पूरी तरह डाटा आधारित होगी क्योंकि पहली तीन उद्योग क्रांति में हम पिछड़ चुके हैं।