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नोटा वाले ताऊ

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आगरालीक्स….
आजकल मैं जब भी ताऊजी की पेशानियों पर बल देखता हूँ, न जाने क्यों मुझे टोबा टेक सिंह की याद आने लगती है। अरे वही मंटो की मशहूर कहानी वाले सरदार बिशन सिंह। और याद आने लगता है, उसका वह अबूझ सा डायलॉग—“औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दि दाल आफ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान आफ दी दुर फिटे मुँह!” इन दिनों ताऊजी भी कुछ-कुछ सरदार बिशन सिंह जैसे होते जा रहे हैं।
वे हमारे मोहल्ले के बड़े बुज़ुर्ग हैं। हम सभी प्यार से उनको ताऊजी कहते हैं। उनकी बड़ी इज्जत करते हैं। वे पहले मास्टर थे। और अभी हाल ही में हेडमास्टर बन कर रिटायर हुए हैं। पर अभी भी उनके सिर पर मास्टरी का भूत सवार है। वे अक्सर हम लोगों को पकड़ लेते हैं। और तरह तरह के सवाल पूछने लगते हैं। मसलन, तक्षशिला कहाँ है? सिकंदर ने भारत पर कब आक्रमण किया था? उसकी सेनाएं भारत के किस हिस्से तक आ पहुँची थीं? अंदमान निकोबार कहाँ है? काला पानी की सजा में वहां किस स्वतंत्रता सेनानी को कैद हुयी थी? श्यामा प्रसाद मुखर्जी कौन थे? गुजराती या बंगाली? और विवेकानंदउ से उनका क्या सम्बन्ध है?
ताऊजी तीन भाषाओँ के ज्ञाता हैं। इसलिए वे ट्रांसलेशन पूछ पूछ कर हम सब की नाक में दम कर देते हैं। एक बार तो उन्होंने मुझे ही पकड़ लिया। और पूछने लगे कि “चांदी की दीवार ना तोड़ी, प्यार भरा दिल तोड़ दिया, एक धनवान की बेटी ने, निर्धन का दामन छोड़ दिया“ का रिदमिक ट्रांसलेशन करो। वैसे तो मैं अपने आप को बड़ा तन्ने खां समझता हूँ। पर रिदमिक ट्रांसलेशन? नाम ही पहली बार सुना था। लिहाज़ा पानी पीने के बहाने ऐसा भागा कि आज भी जब भी वे सामने पड़ते हैं, प्यास के मारे गला सूखने लगता है।
ताऊजी हरेक को सलाह देना, उसको समझाना-बुझाना और उसको देश-दुनिया पर लेक्चर देना अपना परम कर्त्तव्य समझते हैं। उनको लगता है कि परम पिता परमेश्वर ने उनको इस धरती पर इसी कार्य के लिए भेजा है। वे सब को सुधारना, ज्ञानी-गुणी और आदर्श इंसान बनाना चाहते हैं। पता नहीं, उनके पास आँख और दिमाग है कि एक्स रे की मशीन? हरेक की कमियां उनको तुरंत नज़र आ जाती हैं। और वे उन कमियों को ठीक करने के लिए फ़ौरन ही अपनी कमर कस लेते हैं। और जब तक बंदा सुधर नहीं जाता या उनके सुधार अभियान से तंग आकर उनके चंगुल से निकल कर उड़न छू नहीं हो जाता, वे उसके पीछे पड़े रहते हैं।
उनके यार-दोस्तों और रिश्तेदारों का कहना है कि वे शुरू से ही ऐसे थे। मास्टरी के दौरान भी इन्हीं आदतों के कारण उनकी कभी किसी से नहीं पटी। कई कई बार तो उनकी नौकरी पर भी बन आयी। विद्वान थे। काबिल थे। सादा जीवन उच्च विचार था। कम पैसे पर काम कर रहे थे। बच्चे उनके भक्त थे। स्कूल उनके नाम से जाना जाता था। इसलिए कभी निकाले नहीं गए। इसलिए लोग बदल गए। स्कूल का माहौल बदल गया। पर वे नहीं बदले। और अब रिटायर हो कर वे हमें बदलने पर तुले हुए हैं। खुद के बच्चे नौकरी पर बाहर रहते हैं। बेटी की शादी कर दी है। वह ससुराल में है। घर पर बूढ़ी पत्नी और मोहल्ले में हम। हालाँकि हम उनसे भरसक कटने की फिराक में रहते हैं, पर अक्सर हमें उनके ज्ञान और विद्वत्ता की ज़रुरत भी पड़ जाती है। हम उनको एक चलती फिरती लाइब्रेरी या इनसाइक्लोपीडिया मानते हैं। वे अक्सर इम्तहान के समय, कम्पटीशन और क्वीज्स के वक़्त हमारी बड़ी मदद करते हैं। चाहे रात हो या दिन या कि एकदम सुबह, वे हमेशा ही हमारे लिए संकटमोचन प्रभु की तरह प्रकट हो जाते हैं।
ताऊजी जात-पात, ऊँच-नीच और धर्म-अधर्म को बिलकुल नहीं मानते। इस मायने में उनके विचार बड़े ही सुलझे हुए हैं। उनका मानना है कि धर्म एक व्यक्तिगत चीज़ है। और उसे हमेशा निजी ही रहना चाहिए। अगर धर्म कर्मकांडों के चक्कर में फंस कर सार्वजनिक प्रदर्शन की चीज़ बन जाता है, तो वह धर्म के अनुयायियों के सिर पर अफीम के नशे की तरह चढ़ जाता है। और इंसान को धर्मांध बना देता है। वे कहते हैं कि इसलिए तो हमारे संविधान में धर्मनिर्पेक्षता का प्रावधान रखा गया है। इसका मतलब है कि या तो सभी धर्मों के साथ एकसमान व्यवहार करो या कि फिर धार्मिक पचड़ों में पड़ो ही मत। उनका मानना है कि राजनीति को हमेशा धर्म से अलग रखा जाना चाहिए। मतलब यह कि धर्म की राजनीति मत करो। इसी तरह या तो सभी जातियों को बराबरी का दर्ज़ा दो या फिर जातिविहीन बन जाओ। और जातिवादी राजनीति का हमेशा निषेध करो।
लेकिन जब भी कोई चुनाव होने वाला होता है और उसकी गर्मी ज्यों-ज्यों बढ़ने लगती है, ताऊजी की परेशानी भी बढ़ने लगती है। वे बात बात पर चिड़चिड़ा उठते हैं। चुनावों की मारा-मारी, मूल्यों का अवमूल्यन, बातचीत और जुबान के स्तर के लगातार नीचे गिरते जाने से बुरी तरह क्षुब्ध हो जाते हैं। बात-बात पर बड़ाबड़ाने लगते हैं। अरे, इन नेताओं को शर्म आये न आये, मुझे तो शर्म आ रही है। क्या ये हम हैं? उस देश के वासी, जिस देश में गंगा बहती है? क्या इसी बदजुबानी से होगा विकास? क्या इसी से होगा इण्डिया शाइनिंग? न कोई सिद्धांत, न कोई विचार और न ही कोई स्पष्ट रोड-मैप। ऐसा कैसे हो जायेगा कि अगर कोई इस पार्टी को वोट देगा, तो देशभक्त और अगर उस पार्टी को वोट देगा, तो देशद्रोही? अरे भाई, अगर कोई तुम्हारी पार्टी को वोट नहीं देगा, तो क्या तुम उसे पकिस्तान भेज दोगे? अगर कोई तुम्हारी हाँ में हाँ नहीं मिलाएगा, तो उसे बोरिया बिस्तर सहित बांग्लादेश डिपोर्ट कर दोगे? है तुम्हारे पास ऐसा कोई अधिकार? और अगर है, तो यह तुमको दिया किसने?
ताऊजी फ्रस्ट्रेट हो कर पूछते हैं कि अगर मान लो कि मुझे कोई कैंडीडेट पसंद ही न आये और मैं नोटा का बटन दबा दूं, तो? नोटा दबाना भी तो हमारा संवैधानिक अधिकार है। तब क्या मैं मंटो का टोबाटेक सिंह बन जाऊंगा? न हिन्दुस्तान का, न पकिस्तान का। वे हरेक से पूछते हैं। पर अपनी अपनी पसंद की सरकार बनवाने की धुन में मद-मस्त हुए लोग एक दूसरे को रूई की तरह धुनते रहते हैं। कोई भी उनको सही जवाब नहीं देता। और वे थक हार कर टोबा टेकसिंह की तरह अबूझ सा कुछ बड़बड़ाने लगते हैं।
अरविन्द कुमार
ई-माल:tkarvind@yahoo.com

Written by
Agraleaks Team

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