मथुरालीक्स…‘किताबी ज्ञान के साथ बच्चों का मन भी पहचान’, एक्सपर्ट्स की राय है कि इस नए दौर में शिक्षकों को अब स्टूडेंट्स का मेंटर, काउंसलर और रोल मॉडल भी बनना होगा
मथुरा में विद्यार्थियों का मानसिक स्वास्थ्य आज शिक्षा व्यवस्था के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती है। शैक्षणिक दबाव, परीक्षा का तनाव, पारिवारिक परिस्थितियां, व्यवहार संबंधी समस्याएं और भावनात्मक असंतुलन बच्चों के व्यक्तित्व एवं सीखने की क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में शिक्षक की भूमिका केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि उन्हें विद्यार्थियों के मेंटर, काउंसलर और रोल मॉडल के रूप में भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
इसी उद्देश्य से जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट), मथुरा द्वारा राजकीय एवं अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाचार्यों के लिए ‘शिक्षक एक परामर्शदाता, मार्गदर्शक एवं प्रेरणास्रोत के रूप में’ विषय पर एक दिवसीय सेमिनार आयोजित किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डायट मथुरा के प्राचार्य डॉ. धर्मेंद्र शर्मा ने की तथा कार्यक्रम का संचालन डायट मथुरा के ही प्रवक्ता डॉ. गौरव गुंजन ने किया। बिहेवियरल साइंटिस्ट एवं लाइफ कोच डॉ. नवीन गुप्ता ने शिक्षकों की बहुआयामी भूमिका तथा विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष जोर दिया।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक बच्चे की अपनी अलग मनोवैज्ञानिक विशेषताएं, भावनात्मक आवश्यकताएं और सीखने की क्षमता होती है। शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में होने वाले बदलाव, तनाव, उदासी, सामाजिक अलगाव, आत्मविश्वास की कमी और अन्य मानसिक स्वास्थ्य संबंधी संकेतों को समझने की संवेदनशीलता विकसित करनी चाहिए।
कार्यक्रम में डीओएस (डिस्कवरी आफ सेल्फ) साइकोमेट्रिक टूल के माध्यम से स्वयं, विद्यार्थियों और दूसरों को समझने की प्रक्रिया पर चर्चा की गई।