आगरालीक्स… ( 13 April ) । चैत्र नवरात्र के दूसरे दिन मां दुर्गा के स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है। उपासना विधि की विस्तृत जानकारी आगरालीक्स में जानिए।
श्री गुरु ज्योतिष शोध संस्थान अलीगढ़ के अध्यक्ष एवं ज्योतिषी पं. हृदय रंजन शर्मा के अनुसार मां दुर्गा का द्वितीय रूप ब्रह्मचारिणी हैं। यहां ब्रह्मचारिणी का तात्पर्य तपश्चारिणी है। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप से प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। अतः ये तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी के नाम से विख्यात हैं।
नवरात्र के दूसरे दिन इनकी पूजा-अर्चना की जाती है, जो दोनों कर-कमलों मे अक्षमाला एवं कमंडल धारण करती है। मां ब्रह्मचारिणी सदैव अपने भक्तों पर कृपादृष्टि रखती हैं। सम्पूर्ण कष्ट दूर करके अभीष्ट कामनाओ की पूर्ति करती है।
संयम की होती है वृद्धि
देवी दुर्गा का यह दूसरा रूप भक्तों एवं सिद्धों को अमोद्य फल देने वाला है। देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। मां ब्रह्मचारिणी की कृपा से मनुष्य को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। जीवन की अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का नाश होता है।
देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूर्ण ज्योर्तिमय है। मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से द्वितीय शक्ति देवी ब्रह्मचारिणी का है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली।
मां ब्रह्मचारिणी. यह देवी शांत और निमग्न होकर तप में लीन हैं। मुख पर कठोर तपस्या के कारण अद्भुत तेज और कांति का ऐसा अनूठा संगम है जो तीनों लोकों को उजागर कर रहा है।
साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में स्थित होता है
-देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला है और बायें हाथ में कमण्डल होता है। देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप हैं। अर्थात तपस्या का मूर्तिमान रूप हैं। इस देवी के कई अन्य नाम हैं, जैसे तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में स्थित होता है। इस चक्र में अवस्थित साधक मां ब्रह्मचारिणी जी की कृपा और भक्ति को प्राप्त करता है।
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि
सर्वप्रथम आपने जिन देवी-देवताओँ एवं गणों व योगिनियों को कलश में आमत्रित किया है, उनकी फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान करायें व देवी को जो कुछ भी प्रसाद अर्पित कर रहे हैं उसमें से एक अंश इन्हें भी अर्पण करें। प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारीभेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें। कलश देवता की पूजा के पश्चात इसी प्रकार नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें। इनकी पूजा के पश्चात मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करें। देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें।
“दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा”
इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें देवी को अरूहूल का फूल (लाल रंग का फूल) व कमल काफी पसंद हैं, उनकी माला पहनायें. प्रसाद और आचमन के पश्चात् पान सुपारी भेंट कर प्रदक्षिणा करें और घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें. अंत में क्षमा प्रार्थना करें। माता रानी की कथा औऱ आरती करें।
शैलपुत्री की हुई पूजा-अर्चना
वहीं चैत्र नवरात्र आज से शुरू हो गए हैं। घरों में घट स्थापना कर माता रानी के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की विधि-विधान के साथ पूजा अर्चना की गई। व्रत रखा गया।