आगरालीक्स…पर्यावरण प्रेमियों ने प्रकृति से जुड़ने और पर्यावरण को समझने के लिए एक अनौखी वॉक कराई, कहा पेड़ों को केवल लकड़ी—हरियाली न समझें, ये हमारे असली दोस्त और संरक्षक
आगरा में एक अनौखी वॉक हई। इसमें पर्यावरण प्रेमियों ने प्रकृति से जुड़ने और पर्यावरण को समझने का एक शानदार अवसर प्रदान किया। पालीवाल पार्क में कदम—कदम चलते हुए पेड़ों को पहचाना गया और उनके फायदों के बारे में जानकारी दी गई। पालीवाल पार्क में आयोजित नेचर वॉक उस समय एक अविस्मरणीय अनुभव बन गई जब अर्जुन, पीली गुलमोहर, गुलमोहर, नींव और तमाल जैसे दुर्लभ एवं परिचित वृक्षों पर खिले रंग-बिरंगे फूलों ने सभी प्रतिभागियों को मानो किसी जादू में बांध लिया। पर्यावरण प्रेमी एवं वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन के कुशल नेतृत्व में आयोजित इस वॉक में न केवल वृक्षों की पहचान की गई, बल्कि उनके वानस्पतिक, औषधीय और पारिस्थितिक महत्व को भी बारीकी से समझा गया। प्रकृति के इस जीवंत पाठशाला में हर कदम पर कुछ नया सीखने को मिला और मन में यह विश्वास और गहरा हुआ कि यदि हम वृक्षों को जानें, तो उनसे प्रेम अपने आप हो जाता है।औषधि, सौंदर्य और पर्यावरण का अनूठा संगम
वॉक का पहला और सबसे प्रभावशाली पड़ाव था - अर्जुन के वृक्ष। ये वृक्ष न केवल फूलों से लदे हुए थे, बल्कि उन पर बड़ी संख्या में सूखे हुए बीज भी लगे थे। श्री जैन ने बताया कि अर्जुन के बीज महीनों की प्रक्रिया के बाद तैयार होते हैं और प्रत्येक वृक्ष हजारों बीज उत्पन्न करता है। यह वृक्ष अत्यंत सहनशील है - कम पानी में भी जीवित रहता है और अधिक जलभराव की स्थिति में भी नहीं मरता। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अर्जुन की छाल हृदय रोगों के लिए एक अत्यंत प्रभावशाली प्राकृतिक औषधि है, जिसे आयुर्वेद में अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है।
आगे बढ़ने पर पीली गुलमोहर के वृक्षों ने सबका ध्यान आकर्षित किया। सुनहरे-पीले फूलों से लदे इन वृक्षों की छटा देखते ही बनती थी। यह वृक्ष तेज गति से बढ़ता है और अल्प समय में ही फूलों से भर जाता है, परंतु इसकी संरचना अपेक्षाकृत कमजोर होती है। इसके समीप ही लाल-नारंगी फूलों से सुसज्जित गुलमोहर के वृक्ष खड़े थे, जिनकी मनोहरी आभा ने पार्क को एक उत्सवी रंग दे रखा था।
कंजी के वृक्षों पर आ रही नई कोपलें और फूल उन्हें इस मौसम में विशेष रूप से आकर्षक बना रहे थे। के.सी. जैन ने बताया कि यह प्रजाति तेजी से विकसित होती है और यद्यपि यह बहुत लोकप्रिय नहीं है, तथापि पर्यावरणीय दृष्टि से यह महत्वपूर्ण सेवाएं प्रदान करती है। हालांकि कुछ ही दिनों में इसकी पत्तियां कीड़ों से प्रभावित हो जाएंगी - यह प्रकृति का एक अनोखा चक्र है।
पार्क में एकमात्र पीलू अर्थात मिश्फाक के वृक्ष को देखकर सभी ने विशेष उत्साह व्यक्त किया। यह वृक्ष न्यूनतम जल में भी जीवित रहता है और अपनी दुर्लभता के कारण और भी विशेष बन जाता है। केंथ के कांटेदार वृक्षों ने भी सभी को आकर्षित किया।
राधाजी के सर्वाधिक प्रिय वृक्ष तमाल पर लगे फलों को देखकर सभी प्रतिभागियों में एक आध्यात्मिक अनुभूति भी हुई। इन फलों को पकने में लगभग 10 माह लगते हैं और यह अगले वर्ष मार्च-अप्रैल में ही पूर्ण रूप से पक सकेंगे। तमाल का वृक्ष घना, आकर्षक और अत्यंत सहनशील है - बिना पानी के भी यह न केवल जीवित रहता है बल्कि फलता-फूलता है।
नीम के वृक्षों पर फूल और नींबोरियां बनने की प्रक्रिया ने वॉक में एक और रोचक अध्याय जोड़ा। इसी क्रम में बकेन के वृक्ष को देखकर एक रोचक जानकारी सामने आई - यह वृक्ष दिखने में नीम जैसा होता है और अनेक लोग भूलवश इसे नींव समझ बैठते हैं। यह वृक्ष तेजी से बढ़ता है परंतु संरचनात्मक दृष्टि से कमजोर होता है।
सुबबूल और विलायती बबूल के वृक्षों को पहचानते हुए केसी जैन ने बताया कि विलायती बबूल भूमि से पानी को अत्यधिक मात्रा में सोखता है और पर्यावरण के लिए हानिकारक है। सुबबूल कांटारहित होता है और पशु चारे के रूप में उपयोगी है, परंतु ये दोनों प्रजातियां आक्रामक स्वभाव की हैं और देशी वनस्पतियों के लिए खतरा उत्पन्न करती हैं।
नेचर वॉक का सबसे भावपूर्ण एवं प्रेरणादायक क्षण वह था जब सभी प्रतिभागियों ने पार्क में विकसित हो रही कदम्बखंडी - अर्थात कदम्ब वृक्षों का उपवन - का अवलोकन किया। भगवान श्रीकृष्ण के परम प्रिय वृक्ष कदम्ब यहां बड़ी संख्या में तेजी से पल्लवित हो रहे हैं। के.सी. जैन ने गर्व के साथ बताया कि कुछ ही वर्षों में यह उपवन संभवतः प्रदेश की सबसे बड़ी कदम्बखंडी के रूप में विकसित हो जाएगा - यह न केवल पर्यावरण के लिए एक उपलब्धि होगी, बल्कि आगरा की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत को भी समृद्ध करेगी।
वॉक के समापन पर सभी प्रतिभागियों ने यह निर्णय लिया कि आगामी वर्षा ऋतु में वे अच्छी और उपयोगी प्रजातियों के वृक्ष लगाएंगे। इनमें जारूल - जिसे अपनी बैंगनी आभा के लिए जाना जाता है - कुसुम, सीबा स्पेसियोसा और टुबोबिया ओरिया जैसी श्रेष्ठ प्रजातियां सम्मिलित करने का संकल्प लिया गया। यह संकल्प केवल एक वृक्षारोपण कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह प्रकृति के प्रति एक गहरी जिम्मेदारी का सार्वजनिक स्वीकारोक्ति था।
इस प्रेरणादायक नेचर वॉक में किशोर जैन, डॉ. संजीव गोयल, हरप्रीत नंदा सहित अनेक पर्यावरण प्रेमी उत्साहपूर्वक सम्मिलित हुए। सभी ने इस वॉक को न केवल ज्ञानवर्धक बल्कि आत्मिक रूप से संतोषजनक अनुभव बताया और आशा व्यक्त की कि ऐसे आयोजन नियमित रूप से होते रहें, ताकि समाज में वृक्षों के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता बढ़ती रहे।