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Agra News: Like Kashi, Agra is the abode of ancient temples of Shiva….#agranews

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आगरालीक्स…आगरा को ताजनगरी ही नहीं, शिवनगरी भी कहिए. सच्चे मायनों में यह शिव का है धाम. काशी की तरह आगरा के शिव मंदिर भी अति प्राचीन. पढ़ें स्पेशल स्टोरी

आगरा को देश विदेश में ताजनगरी के नाम से जाना जाता है. ताजमहल जैसी खूबसूरत स्मारक यहां मौजूद हैं, लेकिन अगर सच्चे मायनों में देखा जाए तो आगरा शिव नगरी भी है. काशी, अयोध्या की तरह आगरा के शिव मंदिर भी अति प्राचीन है. आगरा के चारों कोनों पर शिव चार रूपों — कैलाश, बल्केश्वर, पृथ्वीनाथ और राजेश्वर के रूप में विराजमान हैं तो शहर के मध्य में प्राचीनतम श्री रावली महादेव और श्री मनकामेश्वर महादेव विराजित हैं. सभी तीर्थों का भांजा कहा जाने वाला बटेश्वर भी आगरा जिले में है. यहां भी शिव विराजित हैं और 101 शिव मंदिरों की भव्य ​श्रृंखला भी है. सावन माह शिव का अतिप्रिय माह है, ऐसे में आगरा के शिव मंदिरों के बारे में पढ़ें जानकारी…

दिन में तीन बार रंग बदलते हैं राजेश्वर महादेव
आगरा के शमसाबाद रोड स्थित राजेश्वर महादेव मंदिर है. मान्यता है कि यहां विराजमान महादेव दिन में तीन बार रंग बदलते हैं. इसका इतिहास करीब 900 वर्ष पुराना बताया गया है. ऐसा कहा जाता है कि एक बार साहूकार नर्मदा नदी से शिवलिंग लेकर आ रहे थे. गांव से पहले उन्होंने रात्रि विश्राम के लिए एक जगह बेलगाड़ी रोक दी. रात्रि में सपने में भगवान ने कहा कि कि शिवलिंग को इसी स्थान पर स्थापित कर दो. लेकिन साहूकार यह नहीं चाहता था. इसलिए उसने सुबह बैलगाड़ी में रखने के लिए शिवलिंग को जमीन से उठाकर ले जाने का प्रयास किया गया, तो बैलगाड़ी आगे ही नहीं बढ़ रही थी. कई गाड़ी और दर्जनों लोगों के प्रयास के बाद भी गाड़ी का पहिया आगे नहीं बढ़ा. इसी खींचतान के दौरान शिवलिंग जमीन पर गिर गई और वहीं स्थापित हो गई. इसके बाद पांच गांव के लोगों ने मिलकर मंदिर का निर्माण कराया. जिसमें गांव उखर्रा, राजपुर, बाग राजपुर, चमरौली और कहरई सम्मलित हैं. मंदिर की सेवा के लिए 24 बीघा जमीन भी जमीदारों द्वारा दी गई थी.

एक ही जलहरी में विराजित दो शिवलिंग
प्राचीन कैलाश महादेव मंदिर की मुख्य विशेषता है कि यहां एक ही जलहरी में 2 शिवलिंग विराजमान है, जोकि स्वयं भगवान परशुराम एवं उनके पिता जमदग्नि ऋषि द्वारा स्थापित हैं। कैलाश महादेव की प्राचीनता को देखते हुए शासन की ओर से काशी की तरह कैलाश कॉरिडोर आगरा में प्रस्तावित है, जिसका काम भी लगातार चल रहा है. बीते रोज ही डीएम ने कैलाश मंदिर कॉरिडोर की समीक्षा की और इसका काम तेजी से करने के आदेश दिए.

पृथ्वीराज चौहान को मिला था शिवलिंग
पृथ्वीनाथ महादेव मंदिर 800 साल पुराना है. एक बार पृथ्वीराज चौहान मंदिर के पास से गुजर रहे थे. उन्होने मंदिर के पास जंगल में अपना घोड़ा बांध दिया. मगर, वह कुछ ही देर में खुल गया. इस पर उन्होंने फिर से घोड़े को बांधा लेकिन वह फिर से खुल गया. कई बार कोशिश करने पर भी ऐसा ही हुआ. तलाश करते समय पृथ्वीराज चौहान को एक शिवलिंग मिला. उन्होंने शिवलिंग को उखाड़ने की कोशिश की लेकिन काफी खुदाई के बाद भी छोर नहीं मिला. इस पर उन्होंने भगवान की पूजा की और मंदिर का निमा्रण कराया. तब से ही मंदिर का नाम भी पृथ्वीनाथ मंदिर पड़ गया.

बल्केश्वर मंदिर
आगरा के यमुना किनारे स्थित बल्केश्वर मंदिर के ​इतिहास के बारे में कहा जाता है कि यह मंदिर करीब 700 साल पुराना है. उस वकत यमुना नदी के किनारे बिल्व पत्र के घने जंगल हुआ करते थे. कटाई के दौरान उन जंगलों में से भगवान महादेव की पिंडी निकली थी और उसी के नाम पर इस मंदिर का नाम बल्केश्वर पड़ा था.

बटेश्वर महादेव
आगरा के बटेश्वर में, जिन्हें ब्रह्मलालजी महाराज के नाम से भी जाना जाता है. भगवान शिवजी का शिवलिंग रूप के साथ-साथ पार्वती, गणेश की मूर्ति रूप भी है. श्रावण मास में कासगंज से गंगाजी का जल भरकर लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव का कांवड़ यात्रा के माध्यम से अभिषेक करते हैं। यहां पर 101 मंदिर स्थापित हैं. इसके बारे में एक प्राचीन कथा है कि 2 मित्र राजाओं ने संकल्प किया कि हमारे पुत्र अथवा कन्या होने पर दोनों का विवाह करेंगे, परंतु दोनों के यहां पुत्री संतानें हुईं. एक राजा ने ये बात सबसे छिपा ली और विदाई का समय आने पर उस कन्या ने, जिसके पिता ने उसकी बात छुपाई थी, अपने मन में संकल्प किया कि वह यह विवाह नहीं करेगी और अपने प्राण त्याग देगी. उसने यमुना नदी में छलांग लगा दी. जल के बीच में उसे भगवान शिव के दर्शन हुए और उसकी समर्पण की भावना को देखकर भगवान ने उसे वरदान मांगने को कहा. तब उसने कहा कि मुझे कन्या से लड़का बना दीजिए तो मेरे पिता की इज्जत बच जाएगी. इसके लिए भगवान ने उसे निर्देश दिया कि तुम इस नदी के किनारे मंदिर का निर्माण करना. यह मंदिर उसी समय से मौजूद है. यहां पर कांवड़ यात्रा के बाद जल चढ़ाने पर अथवा मान्यता करके जल चढ़ाने पर पुत्र संतान की प्राप्ति होती है.

रावली महादेव
शहर के मध्य एमजी रोड के पास​ स्थित रावली महादेव मंदिर का इतिहास मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल से जुड़ा हुआ है. आमेर के राजा मान सिंह युद्ध के लिए अफगानिस्तान गए थे. उन्हें अटक पहाड़ी पर एक शिवलिंग मिला. वे शिवलिंग को लेकर जा रहे थे, आज जहां रावली मंदिर है, वहां उन्होने शिवलिंग रख दिया. इसके बाद शिवलिंग को कहीं और नहीं ले जा सके. मंदिर के आसपास रावल राजपूत रहते थे इसलिए इसका नाम रावली महादेव मंदिर पड़ गया. ब्रिटिशि शासनकाल में आगरा में रेलवे लाइन बिछाई गई, बीच में रावली मंदिर था. शिवलिंग को उस जगह से कुछ दूरी पर विस्थापित करने के प्रयास किए गए लेकिन इंजीनियर सफल नहीं हुए. इसलिए रेल लाइन को मंदिर के सामने घुमाकर बिछाना पड़ा.

मनकामेश्वर महादेव
आगरा के रावतपाड़ा स्थित मनकामेश्वर मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां शिवलिंग की ​स्थापना खुद भगवान शिव ने द्वापर युग में की थी. प्रचलित कथा के अनुसार मथुरा में श्रीकृष्ण के जन्म के बाद उनके बाल रूप के दर्शन की कामना लेकर कैलाश से चले महादेव ने एक रात यहां बिताई थी और साधना की थी. उन्होने प्रण किया था कि यहद वह कान्हा को अपनी गोद में खिला पाए तो यहां एक शिवलिंग की स्थापना करेंगे. अगले दिन वह गोकुल पहुंचे तो यशोदा मैया ने उन्हें भस्म भभूत और जटा जूट धारी रूप को देखकर मना कर दिया कि कान्हा उन्हें देख कर डर जाएगा. तब शिव हीं एक बरगद के पेड़ के नीचे ध्यान लगा कर बैठ गए. शिव को आया जान कन्हैया ने भरी लीला शुरू कर दी और रोते रोते शिव की तरफ इशारा करने लगे. तब यशोदा माई ने शिव को बुला कर कान्हा को उनकी गोद में दिया और तब जाकर कृष्ण चुप हुए और शिव की मनोकामना पूरी हुई. वापसी में शिव ने यहां आकर शिवलिंग की स्थापना की.

Written by
Agraleaks Team

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