आगरालीक्स…देखें वीडियो, ब्रज मंडल में बदल गय आगरा का बल्केश्वर, आचार्य इंद्रेश जी की कथा में श्रोता हुए आनंद विभोर. श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर झूमे श्रद्धालु, समय से आधे घंटे पहले ही फुल हुआ पंडाल
विख्यात कथा व्यास आचार्य इंद्रेश उपाध्याय ने कहा कि यमुना के तट पर बल्केश्वरनाथ महादेव के सानिध्य में यह श्री मद् भागवत कथा हो रही है। मैंने आगरा को बार-बार बल्केश्वर की सीमा कहा, यह आज अच्छा नहीं लगा। आज उमड़े जनसमूह से लग रहा है कि यह बल्केश्वर ही पूरा ब्रज जैसा बन गया है। बल्केश्वर महादेव भक्त मंडल द्वारा बल्केश्वर पार्क में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा का बुधवार को चतुर्थ दिवस था। यह पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर यमुना के तट और ब्रज मंडल की सीमा में होने वाला विशाल और भव्य आयोजन है। श्री कृष्ण जन्मोत्सव का प्रसंग होने के कारण आज श्रोताओं में विशेष उत्साह था, जिससे जन सैलाब उमड़ पड़ा। कथा का समय शाम चार बजे, लेकिन आज पंडाल 3.30 बजे ही भर गया। पंडाल को गुब्बारों से सजाया गया था, वहीं श्रोता भी पीत वस्त्र धारण करके आए हुए थे।‘श्यामा प्यारी, कुंजबिहारी जय-जय श्री हरिदास दुलारी’ भजन से इंद्रेश जी ने आज के प्रसंग की शुरुआत की। उसके बाद बोले कि आगरा भी ब्रज है। यहां के निवासियों का रूप स्वरूप, खानपान भी ब्रजवासियों जैसा है। बोलचाल में भी ब्रजभाषा है। आगरा का एक महल ही प्रसिद्ध नहीं, यहां का खानपान की भी प्रसिद्धि है। चार दिन में अनुभव हुआ है कि जिव्हा के स्वाद के साथ-साथ मन का स्वाद भी अद् भुत है। यही कारण है कि आज तो ऐसा लग रहा है कि आगरावासी यहां उमड़ पड़े हैं। इंद्रेश जी ने सत्संग का महत्व और प्रकार बताए। कहा कि केवल कथा सुनना ही सत्संग नहीं है, सभी इंद्रियों को वश में करना भी सत्संग। वस्त्रों का अच्छा चयन करना भी सत्संग है, क्योंकि जैसे वस्त्र पहनते हैं, वैसा ही मन बनता है, विचार बनते हैं। खानपान भी सत्संग है, हम जो खाते हैं, उसमें भगवत भक्ति का भाव होना चाहिए। अच्छे लोगों का संग करना भी सत्संग है, क्योंकि जैसे लोगों के साथ रहेंगे, वैसा ही मन बनेगा। उन्होंने कहा कि जिनमें सत्य, दया, दान और पवित्रता होती है, वही धर्म की ओर बढ सकता है। पवित्रता में तन और मन की होनी चाहिय़े। दुर्भाग्य है कि शरीर को तो लोग पवित्र बना रहे हैं, लेकिन मन में पवित्रता नहीं है।
आज की कथा के अंत में नंदोत्सव मनाया गया। नंद के आनंद भये जै कन्हैयालाल की गायन के साथ पूरा पंडाल भक्ति से झूम उठा। एक दूसरे को बधाइयां गाई और बधाई वितरित भी की गई। इस मौके पर प्रेम निधि मंदिर, नाई की मंडी के महंत हरिमोहन गोस्वामी व सुनीत गोस्वामी जी ने इंद्रेश उपाध्याय को चित्र भेंट किया। इन के अलावा वृंदावन के संत, महंत भी आए। इनके अलावा अर्चित पांड्या मुख्य यजमान हरीश अग्रवाल तरून अग्रवाल स्नेहा सोवित सिंघल गजल पियूष शैली रश्मी चौहान रजनी गुप्ता आदर्श नन्दन गुप्त ऋषि अग्रवाल चन्द्रेश गर्ग रोहित कल्याल आशीष गुप्ता आदि मौजूद रहे।इनके नर्क का रिजर्वेशन कन्फर्म हो गया
किस प्रकार के कर्म करने से नर्क मिलता है, इंद्रेश जी ने विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में लिखा है कि क्रोधी व्यक्ति, कटु वचन भाषी, असंतोषी, अपने माता-पिता को बैरी मान कर उनसे दूर होने वाले, किसी को बुराई से न रोकने वाले को व्यक्ति के नर्क जाने का रिजर्वेशन समझो कन्फर्म ही हो गया। उन्होंने सूरदास का पद सुना कर समझाया-
तजो रे मन, हरि विमुखन को संग,
जा के संग कुमति उपजत है,
पड़त भजन में भंग।
नाम जप से कटते हैं पूर्व जन्म के बंधन
किसी की एक माला से भगवान रीझ जाते हैं, किसी की दस लाख माला भी बेकार जाती हैं। व्यवहार अच्छा, मन में सरलता और सहजता हो, उस व्यक्ति की माला से प्रभु रीझते हैं। उसी से पूर्व जन्म के बंधन कट जाते हैं। श्रीमद् भागवत का अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि भ से भक्ति, ग से ज्ञान, व से वैराग्य और त से त्याग होता है।
सनातन के लोग ही कर रहे कथावाचकों का विरोध
इंद्रेश जी ने कहा कि कुछ लोग ऐसे हैं, जो घात लगा कर बैठे रहते हैं कि कथावाचक कुछ ऐसा बोलें कि उनका विरोध करें। दुर्भाग्य से, विरोध करने वाले सनातन के लोग ही हैं। कहते हैं कि कथा वाचक बहुत रुपये ले रहे हैं। उन्हीं का विरोध होता है, जिनकी कथा में भीड़ उमड़ती है। उन्होंने पूछा कि हमने कितने महल बना लिए। तीन घंटे बैठकर हरि नाम सुनाने से लोगों की भावना पवित्र हो रही है, क्या यह गलत है। कोई विषय न तो तब भी विरोध के लिए बना दिया जाता है। माता-बहनों की इज्जत लूटी जा रही है, जगह-जगह अपराध हो रहे हैं, उन पर कोई सवाल नहीं उठाता। हम कथावाचकों को ही निशाना बनाया जाता है। कभी-कभी मन विचलित होता है, सोचता हूं कि कथा करने के बाद कहीं शांति स्थल पर चला जाऊं।