आगरालीक्स…आगरा में शुरू हुआ महानाट्य ‘जाणता राजा’. पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा—यह नाटक छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य, पराक्रम का अद्भुत उदाहरण
आगरा में महानाट्य जाणता राजा का शुभारंभ हो गया है. इसका शुभारंभ पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने की. उनके साथ प्रभारी मंत्री जयवीर सिंह भी मौजूद रहे. इस अवसर पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि इस महान नाटक ‘जाणता राजा’ को ध्यान में रखते हुए, छत्रपति शिवाजी महाराज की स्मृति को आगरा में चिरस्थायी रूप देने की जो घोषणाएँ की हैं, वे आने वाले अनेक वर्षों तक इस नगरी में शिवाजी महाराज की अमर गाथा को जीवंत रखेंगी। इसके लिए मैं मंत्री जी को अपनी हार्दिक बधाई देता हूँ।
मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि ‘जाणता राजा’ का यह अद्भुत नाटक मैं पूर्व में तीन बार देख चुका हूँ। पहली बार जब मैं सांसद था, तब हमारे वरिष्ठ नेता स्वर्गीय प्रमोद महाजन जी के प्रयासों से इसका आयोजन दिल्ली में हुआ था। बाद में महाराष्ट्र के औरंगाबाद — जो अब छत्रपति संभाजी नगर के नाम से जाना जाता है — वहाँ भी मैंने इस नाटक का मंचन देखा। मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि इतना सजीव, ऐतिहासिक और भावनात्मक मंचन मैंने अपने जीवन में और कहीं नहीं देखा।

आज ताज नगरी आगरा में इस सांस्कृतिक महोत्सव का हिस्सा बनकर मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ। यह आयोजन उस महापुरुष की अद्भुत प्रतिभा को श्रद्धांजलि है, जो भारतभूमि की उत्कृष्ट संतानों में से एक थे — छत्रपति शिवाजी महाराज।
उन्होंने अपने शौर्य, पराक्रम और नीति के माध्यम से एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। यह नाटक केवल दृश्य नहीं, बल्कि एक संस्कार यात्रा है, जो जनमानस में स्वाभिमान, संस्कृति और कर्तव्यभाव की ज्योति जलाती है। राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान मुझे रायगढ़ किले जाने और उस भूमि को नमन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था — वही स्थल जहाँ शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था। मैं कहना चाहूँगा कि यदि किसी ने रायगढ़ की भव्य नगरीय व्यवस्था नहीं देखी है, तो अवश्य जाए। जिस प्रकार आज हम आधुनिक भारत के योजनाबद्ध शहरों — जैसे गांधीनगर या चंडीगढ़ — की प्रशंसा करते हैं, वैसी ही सुव्यवस्थित और दूरदर्शी नगरी व्यवस्था का अद्भुत उदाहरण रायगढ़ किला भी है।
उन्होंने कहा कि इस नाटक का नाम ‘जाणता राजा’ अत्यंत सार्थक है — जिसका अर्थ है “वह शासक जो जनता का मन जानता है।” जहाँ आमतौर पर कहा जाता है “यह जनता है जो सब जानती है,” वहीं शिवाजी महाराज ऐसे शासक थे, जो अपनी प्रजा की भावना, आवश्यकता और पीड़ा को भली-भाँति समझते थे। उनकी दूरदर्शिता, न्यायप्रियता और करुणा ने उन्हें एक आदर्श शासक बनाया। वे जानते थे कि सच्ची राज्यव्यवस्था तलवार की धार से नहीं, बल्कि नीति और न्याय से चलती है। शिवाजी महाराज का व्यक्तित्व विजयी होने पर भी विनम्र और संघर्ष के क्षणों में भी मर्यादित था। मर्यादा — यह वही विशेषता है जो हमारे लिए भगवान श्रीराम से लेकर आज तक प्रेरणा स्रोत रही है। ‘जाणता राजा’ केवल नाटक नहीं, बल्कि 17वीं शताब्दी के मराठा राज्य और भारत की आत्मा को हमारे वर्तमान से जोड़ने वाला जीवंत सेतु है।
छत्रपति शिवाजी महाराज का चरित्र भारतीय नेतृत्व की नैतिकता का आदर्श है। जब हम “विकसित भारत 2047” के सपने की बात करते हैं, तो यह हमारा कर्तव्य है कि हम आने वाली पीढ़ियों की आकांक्षाओं को पूरा करने हेतु अपने दायित्वों का निर्वाह करें। विकसित भारत का अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि ऐसा भारत है — जहाँ हर नागरिक को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवाएँ, सुरक्षित आजीविका, स्वच्छ परिवेश, और जीवन में समान अवसर प्राप्त हों। जहाँ शासन उत्तरदायी, न्याय सुलभ और पारदर्शी हो, तथा विकास का अर्थ केवल GDP की गति नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, पर्यावरणीय संतुलन और सामाजिक समरसता भी हो। यही समग्र दृष्टि, यही नीति-दर्शन — शिवाजी महाराज की थी।
हमें उनसे यही प्रेरणा लेनी चाहिए — कि नीति, निष्ठा, और सेवा भाव से ही राष्ट्र सशक्त होता है।
मैं दिव्य प्रेम सेवा मिशन का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने इस महान नाटक का आयोजन किया। यह संस्था 1997 में आशीष द्वारा कुछ युवाओं के साथ हरिद्वार में आरंभ हुई थी, जब उन्होंने कुष्ठ रोगियों की सेवा का संकल्प लिया। आज यह मिशन सेवा, संस्कार और समर्पण की एक विराट धारा बन चुका है। अंत में, मैं आप सभी से आग्रह करता हूँ कि हम अपने जीवन में शिवाजी महाराज के आदर्शों का पालन करने का संकल्प लें। सेवा-भाव से राष्ट्रीय हित की दिशा में आगे बढ़ें, अपनी ऊर्जा, प्रतिभा और संसाधनों का एक अंश उन लोगों के लिए समर्पित करें जो विकास की दौड़ में पीछे रह गए हैं।
यही सच्ची राष्ट्र सेवा है, यही आत्मनिर्भर भारत की दिशा है।