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Why the beginning of Navaswatsar from Chaitra Pratipada itself?

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आगरालीक्स… ( 8 April ) । भारतीय नववर्ष 13 अप्रैल मंगलवार से शुरू होगा। नवसंवत्सर का प्रारंभ चैत्र प्रतिपदा से ही क्यों? इसके बारे में विस्तृत जानकारी जानिए आगरालीक्स में।

श्री गुरु ज्योतिष शोध संस्थान अलीगढ़ के अध्यक्ष एवं

ज्योतिषी पं. हृदय रंजन शर्मा के मुताबिक भारतीय नववर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही माना जाता है। इसी दिन से ग्रहों, वारों, मासों और संवत्सरों का प्रारंभ गणितीय और खगोलशास्त्रीय संगणना के अनुसार माना जाता है। आज भी जनमानस से जुड़ी हुई यही शास्त्रसम्मत कालगणना व्यावहारिकता की कसौटी पर खरी उतरी है।

सृष्टि संरचना का दिन भी माना जाता है

विक्रमी संवत किसी संकुचित विचारधारा या पंथाश्रित नहीं है। यह संवत्सर किसी देवी, देवता या महापुरुष के जन्म पर आधारित नहीं है। किसी जाति अथवा संप्रदाय विशेष का नहीं है। हमारी गौरवशाली परंपरा विशुद्ध अर्थों में प्रकृति के खगोलशास्त्रीय सिद्धातों पर आधारित है। और भारतीय कालगणना का आधार पूर्णतया पंथ निरपेक्ष है ।ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्रमास के प्रथम दिन ही ब्रह्मा ने सृष्टि संरचना प्रारंभ की । यह भारतीयों की मान्यता है, इसीलिए हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्षारंभ मानते हैं

-आज भी हमारे देश में प्रकृति, शिक्षा तथा राजकीय कोष आदि के चालन-संचालन में मार्च, अप्रैल के रूप में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही देखते हैं। यह समय दो ऋतुओं का संधिकाल है। इसमें रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं ।

नया रूप धरती है प्रकृति

प्रकृति नया रूप धर लेती है । प्रतीत होता है कि प्रकृति नवपल्लव धारण कर नव संरचना के लिए ऊर्जस्वित होती है । मानव, पशु-पक्षी, यहां तक कि जड़-चेतन प्रकृति भी प्रमाद और आलस्य को त्याग सचेतन हो जाती है । वसंतोत्सव का भी यही आधार है । इसी समय बर्फ पिघलने लगती है । आमों पर बौर आने लगता है । प्रकृति की हरीतिमा नवजीवन का प्रतीक बनकर हमारे जीवन से जुड़ जाती है

महाराजा विक्रामदित्य ने शकों को खदेड़ा था

-इसी प्रतिपदा के दिन आज से 2056 वर्ष पूर्व उज्जयनी नरेश महाराज विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रांत शकों से भारत-भू का रक्षण किया और इसी दिन से काल गणना प्रारंभ की । उपकृत राष्ट्र ने भी उन्हीं महाराज के नाम से विक्रमी संवत कह कर पुकारा। महाराज विक्रमादित्य ने आज से 2056 वर्ष पूर्व राष्ट्र को सुसंगठित कर शकों की शक्ति का उन्मूलन कर देश से भगा दिया और उनके ही मूल स्थान अरब में विजयश्री प्राप्त की। साथ ही यवन, हूण, तुषार, पारसिक तथा कंबोज देशों पर अपनी विजय ध्वजा फहराई । उसी के स्मृति स्वरूप यह प्रतिपदा संवत्सर के रूप में मनाई जाती थी। यह क्रम पृथ्वीराज चौहान के समय तक चला ।

श्रीराम व युद्धिष्ठर का हुआ राज्याभिषेक

महाराजा विक्रमादित्य ने भारत की ही नहीं, अपितु समस्त विश्व की सृष्टि की । सबसे प्राचीन कालगणना के आधार पर ही प्रतिपदा के दिन को विक्रमी संवत के रूप में अभिषिक्त किया। इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचंद्र के राज्याभिषेक अथवा रोहण के रूप में मनाया गया। यह दिन ही वास्तव में असत्य पर सत्य की विजय दिलाने वाला है । इसी दिन महाराज युधिष्ठर का भी राज्याभिषेक हुआ। महाराजा विक्रमादित्य ने भी शकों पर विजय के उत्सव के रूप में मनाया

सामाजिक औऱ धार्मिक कार्यों के अनुष्ठान की धुरी

-आज भी यह दिन हमारे सामाजिक और धार्मिक कार्यों के अनुष्ठान की धुरी के रूप में तिथि बनाकर मान्यता प्राप्त कर चुका है । हम प्रतिपदा से प्रारंभ कर नौ दिन में छह मास के लिए शक्ति संचय करते हैं, फिर अश्विन मास की नवरात्रि में शेष छह मास के लिए शक्ति संचय करते हैं।

Written by
Agraleaks Team

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